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लोकतंत्र में न्याय के मंदिर का अपमान
Aaj Samaaj
|October 09, 2025
एक वकील द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) भूषण रामकृष्ण गवई पर जूता फेंकने की कोशिश न केवल अभूतपूर्व घटना है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर सीधा हमला है। यह मात्र एक व्यक्तिगत उन्माद का प्रकरण नहीं, बल्कि गहन सामाजिक और वैचारिक विषमताओं का प्रतिबिंब है, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारा संवैधानिक तंत्र अब कट्टरपंथ और धर्मान्धता की चपेट में आ रहा है?
सुप्रीम कोर्ट, जो सदैव न्याय के मंदिर के रूप में न्यायिक आस्था का प्रतीक रहा उसके कोर्ट रूम में सोमवार को एक ऐसी अशोभनीय और दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गयी जो न केवल अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़े करती है। एक वकील द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) भूषण रामकृष्ण गवई पर जूता फेंकने की कोशिश न केवल अभूतपूर्व घटना है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर सीधा हमला है। यह मात्र एक व्यक्तिगत उन्माद का प्रकरण नहीं, बल्कि गहन सामाजिक और वैचारिक विषमताओं का प्रतिबिंब है, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारा संवैधानिक तंत्र अब कट्टरपंथ और धर्मान्धता की चपेट में आ रहा है? सोमवार सुबह प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। राकेश किशोर नाम के एक 71 वर्षीय वकील ने अपना जूता उतारकर सीजेआई गवई की ओर फेंक दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह क्रोध एक धार्मिक टिप्पणी से उपजा था, जिसमें जस्टिस गवई ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू देवता विष्णु से संबंधित किसी टिप्पणी का उल्लेख किया था, जिसे वकील ने अपमानजनक माना। हालांकि, विवाद पर जस्टिस गवई अपना स्पष्टीकरण पहले ही दे चुके थे। जूता सीजेआई तक नहीं पहुंचा, लेकिन अदालत की गरिमा और महिमा को तो ठेस लग ही गयी। इस घटना से कोर्ट रूम में हड़कंप मच गया। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत वकील को हिरासत में ले लिया। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कार्रवाई करते हुए राकेश किशोर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। बीसीआई के अनुसार, यह कृत्य अदालत की गरिमा के अनुरूप नहीं है और इसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल हो गया, जहां हजारों यूजर्स ने इसे न्याय के मंदिर का अपमान करार दिया। यह भारत के न्यायिक इतिहास में पहली ऐसी घटना है, जहां किसी वकील ने शीर्ष अदालत के प्रमुख पर प्रत्यक्ष हिंसा का प्रयास किया। सुप्रीम कोर्ट को भारतीय संविधान का संरक्षक माना जाता है। यह एक
Esta historia es de la edición October 09, 2025 de Aaj Samaaj.
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