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अजीब शह हैं ये मूंछें भी
Sarita
|July Second 2025
मूंछें अब मर्द की नहीं, घर की प्रौपर्टी बन चुकी हैं. इन पर ताव देने से पहले, बीवी के भाव जान लेना जरूरी है वरना कहीं ऐसा न हो कि मूंछों के चक्कर में आप का खाना, बरतन और बिस्तर-तीनों ड्राइंगरूम के सोफे पर चले जाएं.
कुछ सालों पहले एक वाक्य बहुत ही चर्चित हुआ था कि मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी. भई, कसम से हम ने तो आज तक न नत्थूलालजी को देखा न उन की मूंछों को. लेकिन आज हम जिन मूंछों की कथा आप को सुनाने जा रहे हैं, कसम से आप को बहुत ही आनंद आने वाला है.
आज हम किस्सा सुना रहे हैं अपने पड़ोसी शर्माजी की मूंछों का जो हम ने कड़कड़ाती ठंड में अपनी बालकनी में चाय पीते हुए सुना. अब क्या करें हमारी बालकनी व उन के बैडरूम की दीवारें लगी हुई हैं. सो, जब भी जोर से बातचीत होती है, हमारे कानों में, चाहे न चाहे, पड़ ही जाती है.
औफिस से आ कर जैसे ही हमें अपने पड़ोसी शर्माजी के घर से ऊंची आवाजें सुनाई दीं, हमारे दोनों कान एकदम से खड़े हो गए. अरे, ऐसा भला क्या हो गया जो शर्माइन इतने ऊंचे स्वर में शर्माजी को डांट रही हैं. फ्लैट में रहने का और कोई सुख हो न हो, एक बहुत बड़ा सुख यह है कि पड़ोस के घर की आवाजें चाहेअनचाहे सुनाई पड़ ही जाती हैं. वह क्या है कि दो ही स्थितियों में इंसान का स्वर ऊंचा हो जाता है- मौका गुस्से का हो या खुशी का. आवाजों की उठापटक से तो लग रहा है कि मौका गुस्से का ही है. हमारे खुराफाती दिमाग में विचारों की उछलकूद चलने लगी कि आखिर माजरा क्या है जो मिसेज शर्मा इतने गुस्से में जोरजोर से बोल रही हैं.
हम अपना चाय का कप ले कर जैसे ही बालकनी की तरफ जाने लगे, हमारी मिसेज ने टोका, "पगला गए हैं क्या जो इतनी ठंड में बालकनी में चाय पीने जा रहे हैं." अब हम उन को कैसे समझाएं कि चाय की चुस्की के साथ यदि पड़ोसी की चटपटी खबर कानों में पड़ जाए तो चाय बिना चीनी के ही मीठी लगने लगती है, ऐसे में क्या सर्दी क्या गरमी.
Esta historia es de la edición July Second 2025 de Sarita.
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