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अकेली औरत शिकंजे में संपत्ति के
Sarita
|July Second 2025
भारतीय कानून में महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर पूरा अधिकार दिया गया है लेकिन जानकारी के अभाव, सामाजिक दबाव और पारिवारिक भय के चलते ज्यादातर महिलाएं अपने इस हक का इस्तेमाल नहीं कर पातीं.
कई बार परिवार या समाज उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाने लग जाता है. रतभूमि पर औरतों को यों तो कई रूपों में पूजने की परंपरा रही, कभी उसे धन की देवी बताया गया, कभी ज्ञान की देवी, तो कभी शक्ति की मगर वास्तविकता में भारत की महिलाओं को हमेशा धन, ज्ञान और शक्ति से दूर रखने की साजिश हुई. न तो उस को पिता या पति की चलअचल संपत्ति का मालिक बनने दिया जाता, न उस के अकेले के नाम पर कोई बैंक बैलेंस होता, न उस की शिक्षा के प्रति कोई गंभीरता होती और न ही उसे शस्त्रबल का कौशल हासिल होता.
उसे तो सदियों से बस दासी बना कर रखने की कोशिश रही. ऐसी दासी जो हर प्रकार से पुरुष पर आश्रित रहे. अपनी हर जरूरत के लिए किसी भिखारी की तरह पुरुष के आगे हाथ फैलाती रहे. मगर समय में कुछ बदलाव आया. धीरेधीरे औरत ने भी शिक्षा पाई, नौकरी पाई और अपने पैरों पर खड़ी हुई.
आज भारत की स्त्री ने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति तो दर्ज करा दी है मगर यह प्रतिशत देश की कुल औरतों के मुकाबले में अभी बहुत ही कम है. पढ़लिख कर अच्छी नौकरियों में आने वाली महिलाएं मात्र 5 फीसदी ही होंगी, बाकी जो पढ़लिख रही हैं वे बस इसलिए कि उन्हें अच्छा घरवर मिल जाए.
पढ़ाईलिखाई शादी के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के लिए की जाती है. जैसे, एक पुरुष की शिक्षा इसलिए नहीं होती है कि उसे अच्छा ससुराल और अच्छी पत्नी मिल जाए बल्कि इसलिए होती है ताकि वह अच्छी नौकरी में आ कर अच्छा धन कमा सके और आर्थिक रूप से सशक्त हो सके. इसी तरह स्त्रियों को भी यह बात समझनी बहुत जरूरी है कि उन की आर्थिक संपन्नता ही उन्हें दास संस्कृति से मुक्ति देगी.
जिस तरह एक या ज्यादा लड़कों को उन के पिता से पैतृक जमीन और धन हासिल होता है और संपत्ति उन में शक्ति और स्वाभिमान का भाव जागृत करती है, उस धन के आधार पर वे तरक्की करते जाते हैं, वैसे ही लड़की को भी पैतृक संपत्ति और ससुराल की संपत्ति पर अपने हक का एहसास रहना चाहिए.
Esta historia es de la edición July Second 2025 de Sarita.
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