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इसरो ने काफी संघर्ष किया है तब जाकर अब सफलता का नया इतिहास लिख पा रहा है

Open Eye News

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September 2023

चंद्रयान तीन की सफलता की गूंज पूरे विश्व में सुनाई देर ही है। पूरे देश में दीवाली जैसा जश्न मनाया गया, किन्तु इस ऐतिहासिक सफलता के भी पीछे भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का ऐतिहासिक संघर्ष छिपा हुआ है।

- योगेंद्र योगी

इसरो ने काफी संघर्ष किया है तब जाकर अब सफलता का नया इतिहास लिख पा रहा है

क्या आप कल्पना कर सकते हैं जिसकी उपलिब्धयों का लोहा पूरी दुनिया मान रही है, उसके वैज्ञानिक कभी साइकिल और बैलगाड़ियों पर रॉकेट को लादकर प्रक्षेपण स्थल तक ले जाते थे। संघर्ष का ऐसा दौर इसरो के वैज्ञानिकों ने देखा जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही रूस और अमेरिका स्पेस का सिकंदर बनने के लिए बेताब हो गए थे। दोनों देश एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहे थे। सबसे पहले 1957 में रूस ने अंतरिक्ष में कदम रखा। इसके बाद अमेरिका भी रूस के पीछे-पीछे चांद पर पहुंच गया। 1969 में अमेरिका ने अपोलो-11 मिशन पर 2 लाख करोड़ खर्च किए थे। जबकि मंगल तक जाने पर भारत को प्रति किलोमीटर 7 रुपए का खर्च आया था। आम तौर पर ऑटो का किराया इससे ज्यादा होता है, मंगलयान की लागत सिर्फ 400 करोड़ थी। चंद्रयान-3 की लागत मिशन इंपासिबल 7 की लागत का सिर्फ एक चौथाई यानि 25 फीसदी है। भारत की अंतरीक्ष की दौड़ में आज जो सुनहरा वर्तमान देखने को मिल रहा है, उसकी संघर्ष की कहानी एक मिसाल है। अंतरीक्ष की इस दौड़ में भारत की विजय पताका लहरा रहे भारत के वैज्ञानिकों ने ऐसे दिन भी देखे हैं जब केरल के मछुआरों के गांव थुंबा की एक चर्च के आगे खाली जगह से रॉकेट लॉन्च किया गया था। चर्च के बिशप के घर को प्रयोगशाला बनाया गया था। इससे भी ज्यादा रोमांचकारी बात यह है कि भारत ने पहले रॉकेट के लिए नारियल के पेड़ों को लांचिंग पैड बनाया था। हमारे वैज्ञानिकों के पास

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