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परंपरागत खेती के जरिये पर्यावरणीय संरक्षण
Open Eye News
|April 2023
घुमंतू कृषि या 'झूम खेती' को आदिम और पर्यावरण के लिए घातक माना जाता है।
मूलतः खेती की इस विधा में जंगली पेड़ों या झाड़-झंखाड़ की छंटाई कटाई के बाद आग लगाकर बुवाई के लिए जमीन तैयार की जाती है और यह तरीका आज भी देश के उत्तर-पूरबी अंचल में प्रचलित है। यूं तो झूम खेती देश के पहाड़ी अंचलों में होती आई है लेकिन लगभग 90 फीसदी चलन इन दिनों उत्तर-पूरबी राज्यों में ही है। अपनी युवावस्था में, बतौर एक पत्रकार, , मैंने भी झूम खेती से पर्यावरण को नुकसान के बारे में बहुत लिखा था। अधिकांश अनुसंधान अध्ययनों के अलावा नामी कृषि विज्ञानी भी बारम्बार इससे होने वाले नुकसान के बारे में आवाज़ उठाते रहे हैं और इसको अवैज्ञानिक एवं पुरातन कृषि ढंग बताते हैं। पर उत्तर-पूरबी जनजातियां इन नुकसानों के बारे में बताए जाने के बावजूद क्यों इस प्रथा को जारी रखे हुए हैं, यह जानने को मैं सदा उत्सुक था। इसका पता तो स्वयं वहां जाकर ही चलना था कि क्यों तमाम चेतावनियों और ताड़नाओं के बावजूद स्थानीय लोगों को झूम खेती न केवल आर्थिक रूप से व्यवहार्य बल्कि पर्यावरण के पुनर्निर्माण में भी सहायक लगती है। आखिरकार, कोशिश करके मैं खोनोमा गांव जा पहुंचा, यह नगालैंड की राजधानी कोहिमा से 20 किमी दूर है। विरोधाभास यह कि जिस गांव में झूम खेती देखने पहुंचा, कुछ साल पहले उसकी तारीफ मुख्यमंत्री ने 'एशिया का सबसे हरा-भरा गांव' होने को लेकर की थी। करीबन 123 वर्ग किमी के क्षेत्रफल वाले इस गांव के पास इस बारे दिखाने को बहुत कुछ है कि पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक स्रोत का बचाव एवं संवर्धन, वन्य जीवों का शिकार सीमित करना और गांव को साफ-सुथरा रखने की खातिर क्या-क्या उपाय अपनाए गए हैं।
Esta historia es de la edición April 2023 de Open Eye News.
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