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परकोटों की दरकार
India Today Hindi
|January 28, 2026
बड़ी टेक कंपनियां अपने एआइ उत्पादों को अपरिहार्य बताती हैं और नियम-कायदों को नवाचार एवं मुक्त व्यापार विरोधी कहकर खारिज करती हैं. नतीजतन भारत को ऐसे वैश्विक नियम-कायदे अपनाने पड़ते हैं जो यहां के लोगों के मुफीद नहीं होते
एआइ गवर्नेस के बारे में भारत का नजरिया इसकी क्षमताओं और कमजोरियों की साफ-साफ समझ से संचालित होना चाहिए. नया साल हमारे नेताओं को सोचने-समझने का मौका देता है कि इसका क्या मतलब है. वे उद्योग की ओर से सामने रखे गए घिसे-पिटे विचारों से आगे बढ़कर एआइ के वैश्विक नियामकीय विमर्श में नेतृत्व की भूमिका का दावा कर सकते हैं. यह भारत के उस समृद्ध इतिहास के अनुरूप होगा जिसमें हम वैश्विक नियम तय होते वक्त अपने विचारों का योगदान देते रहे हैं. यह हंसा मेहता के उस ऐतिहासिक हस्तक्षेप से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने यह पक्का किया कि मानवाधिकारों की सार्वजनिक घोषणा 'पुरुषों' के बजाए 'मनुष्यों' के अधिकारों के बारे में हो. वैसे, संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर इंटरनेट गवर्नेस के लिए वैश्विक निकाय बनाने के भारत के प्रस्ताव को पर्याप्त सियासी ताकत नहीं मिल सकी, मगर वह दूरदर्शी विचार था जिसने जरूरी बहसों की नींव रखी.
वर्षों संयुक्त राज्य अमेरिका में अलग-थलग रहने के बाद मैंने दिल्ली में एक बड़ी टेक्नोलॉजी लीडरशिप समिट में हिस्सा लिया, और एआइ गवर्नेस पर आलोचनात्मक नजरियों को मिटाए जाते देख निराश हुई. राजनीति और उद्योग के अगुआओं ने भारत में एआइ के विकास के लिए उत्साह दिखाया मगर इस बात पर कम ही चर्चा हुई कि नियम-कायदे कैसे नवाचार और विस्तार से ज्यादा सुरक्षा दे सकते हैं. यह एआइ उद्योग के हाथों गढ़े गए उस परेशान करने वाले वैश्विक रुझान (जिसे मैं सिलिकॉन वैली प्रभाव कहती हूं) के अनुरूप है जो एआइ के लिए नियामकीय- मुक्त एजेंडे की तरफदारी करता है. यह बड़ी टेक कंपनियों के एआइ उत्पादों को अनिवार्य बताकर ऐसा करता है. यही नहीं, यह नियम-कायदों को नवाचार-विरोधी और मुक्त व्यापार-विरोधी मानकर ऐसा करता है. यह पहली बार नहीं है जब भारत के सामने ऐसी वैश्विक नियामकीय रूपरेखाएं रखी गई हैं जो उसके लोगों के लिए कारगर नहीं हैं.
Esta historia es de la edición January 28, 2026 de India Today Hindi.
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