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मंटो का ख़त नेहरू के नाम

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December 2025

पंडित जी, अस्सलाम अलैकुम।यह मेरा पहला खत है जो मैं आपको भेज रहा हूं।

मंटो का ख़त नेहरू के नाम

आप माशा अल्लाह अमरीकनों में बड़े हसीन माने जाते हैं, लेकिन मैं समझता हूं कि मेरे नाक-नक्श भी कुछ ऐसे बुरे नहीं हैं। अगर मैं अमरीका जाऊं तो शायद मुझे हुस्न का रुतबा अता हो जाए। लेकिन आप भारत के प्रधानमंत्री हैं और मैं पाकिस्तान का महान कथाकार। इन दोनों में बड़ा अंतर है। बहरहाल, हम दोनों में एक चीज साझा है कि आप कश्मीरी हैं और मैं भी। आप नेहरू हैं, मैं मंटो, कश्मीरी होने का दूसरा मतलब खूबसूरती और खूबसूरती का मतलब, जो अभी तक मैंने नहीं देखा।

मुद्दत से मेरी इच्छा थी कि मैं आपसे मिलूं (शायद बशर्ते जिंदगी मुलाकात हो भी जाए)। मेरे बुजुर्ग तो आपके बुजुर्गों से अक्सर मिलते-जुलते रहे हैं लेकिन यहां कोई ऐसी सूरत न निकली कि आपसे मुलाकात हो सके। यह कैसी ट्रेजडी है कि मैंने आपको देखा तक नहीं। आवाज़ रेडियो पर अलबत्ता जरूर सुनी है, वह भी एक बार। जैसा कि मैं कह चुका हूं कि मुद्दत से मेरी इच्छा थी कि आपसे मिलूं, इसलिए कि आपसे मेरा कश्मीर का रिश्ता है, लेकिन अब सोचता हूं इसकी ज़रूरत ही क्या है? कश्मीरी किसी न किसी रास्ते से, किसी न किसी चौराहे पर दूसरे कश्मीरी से मिल ही जाता है। आप किसी नहर के करीब आबाद हुए और नेहरू हो गये और मैं अब तक सोचता हूं कि मंटो कैसे हो गया? आपने तो खैर लाखों बार कश्मीर देखा होगा। मुझे सिर्फ बनिहाल तक जाना नसीब हुआ है। मेरे कश्मीरी दोस्त जो कश्मीरी ज़बान जानते हैं, मुझे बताते हैं कि मंटो का मतलब 'मंट' है यानी डेढ़ सेर का बट्टा। आप यकीनन कश्मीरी ज़बान जानते होंगे। इसका जवाब लिखने की अगर आप जहमत फरमाएंगे तो मुझे जरूर लिखिए कि 'मंटो' नामकरण की वजह क्या है?

अगर मैं सिर्फ डेढ़ सेर हूं तो मेरा आपका मुकाबला नहीं। आप पूरी नहर हैं और मैं सिर्फ डेढ़ सेर। आपसे मैं कैसे टक्कर ले सकता हूं? लेकिन हम दोनों ऐसी बंदूकें हैं जो कश्मीरियों के बारे में प्रचलित कहावत के अनुसार 'धूप में ठस करती हैं।'

मुआफ़ कीजिएगा, आप इसका बुरा न मानिएगा। मैंने भी यह फर्जी कहावत सुनी तो कश्मीरी होने की वजह से मेरा तन-बदन जल गया। चूंकि यह दिलचस्प है, इसलिए मैंने इसका जिक्र तफरीह के लिए कर दिया है। हालांकि मैं और आप दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि हम कश्मीरी किसी मैदान में आज तक नहीं हारे।

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