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कैसे रखें जन्माष्टमी का व्रत?
Sadhana Path
|August 2025
कहते हैं कोई भी व्रत करने के लिए मन में श्रद्धा का होना परम आवश्यक है। मन के आन्तरिक भाव से किया गया व्रत सीधा भगवान तक पहुंचता है, परन्तु शास्त्रों के अनुसार विधिपूर्वक किया गया व्रत ही अधिक फलता है। इसलिए जानें कैसे करें जन्माष्टमी का व्रत।
पौराणिक काल से ही व्रत करने की रीत भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। कहते हैं 5000 वर्ष पूर्व जब भक्तगण ईश्वर को ही अपनी आत्मा और प्राणों की शक्ति मानते थे उस समय उन्होंने व्रत करना आरंभ किया और तब से लेकर आज तक व्रत का चलन हमें ईश्वर की अनुभूति कराता चला आ रहा है। ऐसा माना जाता है, जो भी व्यक्ति व्रत करता है वह ईश्वर के सीधे संपर्क में आ जाता है और उसका हृदय निर्मल भावों से परिपूर्ण हो जाता है फिर उसके मन में ईश्वर के अलावा कोई भी अन्य चीज नहीं रहती वह पवित्र हो जाता है, व्रत करने से उसे गंगा में स्नान से मिली पवित्रता मिल जाती है और वह अनुभव करता है ईश्वर के प्रताप को जो उसे बुद्धि एवं शक्ति देता है।
शास्त्रों में भी कुछ ऐसी ही बात देखने को मिलती है। हमारे शास्त्रों के अनुसार व्रत करने से व्यक्ति का मन और तन प्रसन्न, निर्मल, शुद्ध एवं हल्का हो जाता है।
यूं तो हमारी भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं में हर ईश्वर (भगवान) विशेष के लिए एक व्रत का विधान है और हर व्रत का अपना ही एक महत्त्व है एवं हर व्रत से ही पुण्य एवं आशीर्वाद मिलता है परन्तु फिर भी एक ऐसा व्रत है जिसे लगभग पूरा भारत ही बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाता है वह है 'श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत'।
व्रत विधि- जिस भी व्यक्ति को जन्माष्टमी का व्रत रखना हो उसे प्रातः काल ब्रह्म मुहुर्त में उठकर यानी प्रातःकाल 4:00 से 5:30 बजे के बीच उठकर अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर यह संकल्प करना चाहिए।
अहं अढ्य मनोकामना सिद्धि निवित्तम्।
श्री जन्माष्टमी वृतम् करिष्य ॥
अर्थात् मैं अपनी मनोकामनाओं की सिद्धियों के लिए जन्माष्टमी का व्रत करने का संकल्प करता या करती हूं। फिर मन, वचन और कर्म की शुद्धि के लिए तीन आचमन करें।
चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर कलश पर आम के पत्ते एवं नारियल स्थापित करें एवं कलश पर स्वस्तिक का चित्र भी बनाएं। इन आम के पत्तों से वातावरण शुद्ध एवं नारियल से व्रत पूर्ण होता है। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। एक थाली में कुमकुम, चंदन, अक्षत, पुष्प (सफेद या पीले), तुलसी दल या पत्र, मोली कलावा रख लें।
Esta historia es de la edición August 2025 de Sadhana Path.
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