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कैसे बनते हैं होली के रंग?

Sadhana Path

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March 2025

होली के अवसर पर अनेक तरह के अच्छे तथा पक्के, सूखे और पानी में घुलने वाले रंग बेचे जाते हैं, लेकिन क्या कभी आपने इस बात पर विचार किया है कि ये रंग कैसे बनते हैं? और कुछ रंग कच्चे क्यों होते हैं और कुछ रंग पक्के क्यों होते हैं? आइए, हम आपको बताएं कि रंग व गुलाल बनते कैसे हैं?

- सप्रिया

कैसे बनते हैं होली के रंग?

होली का त्योहार हर वर्ष आता है। मस्ती और तरंग भरा फागुन का त्योहार होली अपने साथ जुड़ी अनेकों खट्टी-मिठी बातें प्यार, त्याग, द्वेषरहित, आपसी मेल-मिलाप, लेकर आता है, बच्चे, बड़े सभी उत्साह से भर जाते हैं। बच्चे कई दिन पहले से ही तरह-तरह के रंग और गुलाल खरीदने लगते हैं। बच्चों के साथ बड़े भी पूरा उत्साह दिखाते हैं, पर इस उत्साह में यह रसायनिक रंग, होली को बेरंगा कर जाते हैं। रासायनिक रूप से मिश्रित तेजाबी रंग हमारी त्वचा और वस्त्रों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। यह भी जान लेना आवश्यक है।

  • होली के अवसर पर सबसे ज्यादा बिकता है गुलाल। बड़े-बड़े बर्तनों में पहाड़ों जैसे इसके ढेर बनाकर हर दुकानदार इसी रंग को सबसे आगे रखता है। होली का गुलाल वैसे तो पौधों से परंपरागत रूप से बनाया जाता था, लेकिन आजकल रासायनिक रूप से संश्लेषित या मिला-जुला गुलाल ही ज्यादा बिकता है। मूलत: सभी रंग पौधों और जानवरों से ही प्राप्त होते हैं पर आज के जमाने में जब हर कोई रंगों की मांग कर रहा है, तो इस भारी मांग को पूरा करने के लिए इसे रासायनिक विधियों से मिश्रित कर बड़ी मात्रा में तैयार किया जाता है। प्राकृतिक स्रोत से तैयार रंगों की तुलना में ऐसा संश्लेषित रंग सस्ता भी होता है। दुकानदार के बर्तन में जो गुलाल का ढेर रखा होता है, वह रंग नहीं होता। रंग की मात्रा थोड़ी सी ही होती है। इसमें फ्रेंच खड़ियां, स्टार्च, खाने का नमक, बोरिक एसिड वगैरह रहते हैं। रंग की मात्रा को बढ़ाने व इसे हल्का करने के लिए ऐसा किया जाता है।

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