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द्वादश भाव एक आध्यात्मिक विवेचना
Jyotish Sagar
|August 2025
जन्मकुण्डली का द्वादश भाव मोक्ष त्रिकोण के तीन भावों यथा; चतुर्थ, अष्टम और द्वादश में से एक है।
इसे 'मोक्ष स्थान' की संज्ञा भी दी गई है। जातक की जन्मपत्रिका का द्वादश भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाव माना गया है। द्वादश भाव को हम मुक्ति, पूर्ण स्वतंत्रता, त्याग, मोक्ष अथवा देने वाला भाव मानते हैं। किसी भी जन्मकुण्डली में द्वादश भाव सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाव होता है, जिसका जातक के जीवन में गहरा भौतिक और आध्यात्मिक महत्त्व होता है। मानव जन्म का अंतिम सत्य मुक्ति है। इस प्रकार जन्मकुण्डली के प्रथम भाव से लेकर द्वादश भाव तक की यात्रा जन्म से लेकर मोक्ष तक का सफर मान सकते हैं। जन्मकुण्डली का प्रथम भाव जातक स्वयं है, उसका व्यक्तित्व है, उसकी आत्मा है। अपने जीवनकाल के समस्त कर्मों को भोगते हुए जातक जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचता है, तब उसकी अंतिम इच्छा मुक्ति प्राप्ति की होती है।
आम बोलचाल में इस मुक्ति से तात्पर्य हम जीवन के उस अंतिम समय से लेते हैं, जब जातक अपने सारे कर्म समाप्त कर चुका होता है। हमारे प्रत्येक प्रकार के कर्म के पीछे कुछ न कुछ अपेक्षाएँ होती हैं, इच्छाएँ होती हैं। किसी न किसी उद्देश्य को लेकर हमारे द्वारा कर्म किया जाता है। इस प्रकार मोक्ष के स्थूल स्वरूप को हम मानव जीवन से मुक्ति ही मान लेते हैं। दूसरी ओर, यदि हमारे सारे कर्म, कर्म फल की इच्छाओं से मुक्त हों और स्वयं को इस बन्धन से मुक्त रखते हुए निष्काम कर्म में जुटे रहें, यही स्थिति वास्तविक मुक्ति अर्थात् मोक्ष है।
हम कह सकते हैं कि हमारे कर्म, फल की आशा, अभिलाषा अथवा इच्छाओं से परे हों। यहाँ एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि मुक्ति के लिए किसी उम्र विशेष के आने का इन्तजार करने की आवश्यकता नहीं होती। वस्तुतः आप जहाँ हैं, जिस जगह हैं, वहीं मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं। बस आवश्यकता है, तो केवल इस बात की आपके कर्म किसी भी प्रकार से बन्धन में बँधे नहीं हो। फल की इच्छा किए बिना निष्काम भाव से कर्म करते रहना हमारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। यही बात श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कही है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचना।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
- अध्याय 2, श्लोक 47
Diese Geschichte stammt aus der August 2025-Ausgabe von Jyotish Sagar.
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