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भाषाई विविधता का सौंदर्य

Jansatta Lucknow

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July 30, 2025

भाषाएं अगर एक-दूसरे की विरोधी होने लगेंगी तो वैविध्य में जो सुंदरता रही है और जिस वजह से भारत को विविधताओं का अनुपम देश कहा जाता है, उस छवि को नुकसान होगा और सांस्कृतिक रूप से हम कमजोर होंगे।

- अनुराग सिंह

भारत को विविधता में एकता के लिए जाना जाता है। यहां सांस्कृतिक वैविध्य का अनूठापन है। देश में संस्कृति के कई पहलू जैसे खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन और बोली-भाषा में भिन्नता के स्वरूप का सौंदर्य देखने को मिलता है। भाषा किसी संस्कृति की संवाहिका होती है और यह संस्कृति के सौंदर्य को निखारती है। किसी एक भाषा को जानना वहां की पूरी संस्कृति से परिचय करना होता है। हाल के दिनों में महाराष्ट्र में भाषाई विवाद को तूल दिया गया, जिसके बाद कई तरह के सवाल उठे। अभी भी बाजार में, ट्रेन में और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह के विवाद देखने को लगातार मिल रहे हैं। इससे पहले बंगलुरु जैसे शहर में भी स्थानीय भाषा को लेकर विवाद हो चुके हैं, जहां बहुत बड़ी आबादी वहां की मूल निवासी नहीं है। राजनीति से प्रेरित होकर तमिलनाडु सदैव हिंदी का विरोध करता रहा है। ऐसे में भाषाएं अगर एकदूसरे की विरोधी होने लगेंगी तो वैविध्य में जो सौंदर्य रहा है, जिस वजह से भारत को विविधताओं का अनुपम देश कहा जाता है, उस छवि को नुकसान होगा और सांस्कृतिक रूप से हम कमजोर होंगे। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन पर चर्चा करना आवश्यक हो गया है।

बहुधा ऐसे विवाद राजनीति से प्रेरित होते हैं। महाराष्ट्र में हाल में जो हुआ, उसे राजनीति के लिए भाषा के कंधे का इस्तेमाल कर और उसे अस्मिता से जोड़कर सामान्य लोगों को दिग्भ्रमित करने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है। लोगों को धमकाने और मारपीट करने वाले विशेष राजनीतिक दल के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। जाहिर है कि वे सत्ता के केंद्र में नहीं हैं तो कुछ करते हुए दिखना उनकी जरूरत है। सरकार जब तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को पढ़ाने के लिए कह रही है तो किसी भी कारण उसका विरोध करना मानो उनका नैतिक दायित्व बन जाता है। महाराष्ट्र में पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी भाषा को मराठी और अंग्रेजी के बाद तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने को लेकर यह विवाद शुरू हुआ और अब यह पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है। सरकार ने त्रिभाषा सूत्र को अपनाते हुए अपनी अधिसूचना में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य कर दिया था। हालांकि, विवाद के बाद अनिवार्य शब्द को हटा लिया गया।

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