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नकाब

Sarita

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October Second 2025

दिल टुकड़ेटुकड़े हो जाता है जब विश्वास टूटता है. कोमल की यही स्थिति थी. वह समझ नहीं पा रही थी, कैसे वह स्टीव के मुखौटे चढ़े चेहरे को पहचान न सकी.

- अरुणा सभरवाल

नकाब

दिल टुकड़ेटुकड़े हो जाता है जब विश्वास टूटता है.

कोमल की यही स्थिति थी. वह समझ नहीं पा रही थी, कैसे वह स्टीव के मुखौटे चढ़े चेहरे को पहचान न सकी. तझड़ जाने को था, शरद ऋतु आने वाली थी. मगर पतझड़ कोई चुपचाप थोड़े ही चला जाता है, शोर मचा कर जाता है. यों समझिए, चारों ओर अपना रंग दिखा कर जाता है. कहीं नंगे पेड़ स्थिर खड़े तमाशा देखते हैं, कहीं रंगबिरंगे सूखे पत्तों का जाल बिछा रहता है.

मैं ने उठते ही खिड़की का परदा हटाया. चारों और अंधेरा था. मोटीमोटी धुंध छितराई थी. कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. चारों और एक भयावह सा सन्नाटा पसरा था. पलभर को मुझे लगा कि अभी सुबह नहीं हुई, शायद मैं नींद में ही चल रही हूं. मैं ने झट से टैलीविजन औन किया. मौसम की आकाशवाणी सुनी. आकाशवाणी के अनुसार, आज मौसम साफ नहीं होने वाला, दिनभर धुंध और बारिश का सिलसिला चलता रहेगा.

मैं ने बाहर जाने का फैसला रद्द कर दिया. थोड़ा सुस्ताने व नाश्ता करतेकरते 11 बज चुके थे. बाहर देखा तो अचानक धुंध साफ हो चुकी थी. पतझड़ की अलसाई धूप ने वातावरण को रोशन कर दिया था. मरियल सी धूप पड़ने से घास पर बिछे रंगबिरंगे पत्तों में थोड़ी चिरमिराहट भी आ गई थी. मंदमंद बयार के झोंकों से पत्ते गुनगुनाने लगे थे.

प्रकृति का यह अद्भुत दृश्य देख कर मेरे भीतर की बच्ची मचलने लगी. मैं ने बूट डाले, कोट पहना, मफलर गले में डाला और फिर पत्तों से खेलने लगी. कभी उन्हें दोनों हाथों में उठा कर उछालती. उन की चिरमिराहट सुनने के लिए कभी उन पर चलती. कभी सुंदर सा पत्ता ले कर उसे फूंक मार कर उड़ाने की कोशिश करती.

खेलखेल में ऐसी लीन हुई कि फोन तक की घंटी सुनाई न दी. मोबाइल को हाथ में रखने की आदत तो है नहीं. थक कर भीतर आई तो 4 मिस्डकौल थीं, वह भी कोमल की. आश्चर्य हुआ क्योंकि कोमल तो कभी किसी को फोन करती नहीं. जो उस से मिलना चाहता है उस के अड्डे पर जा कर मिल लेता है. मुझे कोमल की चिंता होने लगी. कई बार कोशिश की संदेश सुनने की. हर बार अलसाया सा संदेश ही मिला.

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