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बढ़ती आत्महत्याएं जिम्मेदार सामाजिक विसंगतियां
Sarita
|July First 2025
दुनियाभर में हर साल कोई 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं और इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाना आसान नहीं है कि क्यों कोई आत्महत्या करता है और इस के पहले सिर्फ और सिर्फ यही क्यों सोचता रहता है कि इसे कैसे अंजाम देना है. क्यों नहीं वह अपने मन की भड़ास किसी से शेयर कर पाता?
'आत्महत्या मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि सामाजिक समस्या है', प्रसिद्ध फ्रेंच समाजशास्त्री एमाइल दुर्खीम द्वारा 1897 में प्रकाशित फ्रेंच भाषा की पुस्तक, 'ले सुसाइड: एट्यूड डे सोशियोलॉजी’ में यह बात कही गई है. आज जैसेजैसे वास्तविक दुनिया से कट कर लोग सोशल मीडिया की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं वैसेवैसे वे डिप्रैशन और फ्रस्ट्रेशन के शिकार भी होते रहे हैं.
हैरत की बात यह है कि अधिकतर आत्महत्याएं अचानक कम बल्कि सुनियोजित तरीके से ज्यादा हो रही हैं. इन्हें रोका तो नहीं जा सकता लेकिन कम तो किया जा सकता है बशर्ते विक्टिम के पास कोई सही सलाह देने वाला हो. लेकिन, वह है कौन? आइए देखते हैं-
राजधानी दिल्ली के भारत नगर इलाके में 12 मई को एक दंपती और उन के 2 बच्चों ने सुबह कैमिकल पी लिया. इस घटना में पति व दोनों बच्चों की इलाज के दौरान मौत हो गई. पुलिस की शुरुआती जांच में आर्थिक तंगी की वजह से खुदकुशी करने की बात सामने आई.
पुलिस के मुताबिक 45 वर्षीय हरदीप सिंह, पत्नी हरजीत कौर और 2 बच्चों के साथ चंदर विहार में रहते थे. परिजनों के मुताबिक, हरदीप पत्नी और बच्चों सहित रात से ही गायब थे. सुबह वे संगम पार्क स्थित अपनी दुकान में पहुंचे. वहां जंग रोकने वाला कैमिकल रखा हुआ था जिसे चारों ने पी लिया. जब उन की तबीयत बिगड़ने लगी तो बेटे ने अपनी बुआ अवनीत कौर को फोन कर आत्महत्या करने की बात बताई.
ऐसी खबर को पढ़ कर कुछ देर के लिए हर किसी का मन खिन्न हो जाता है लेकिन उन के बारे में ज्यादा सोचने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ती जिन्हें, चाहे जो वजह हो, आत्महत्या या परिवार सहित आत्महत्याएं करने जैसा आत्मघाती कदम उठाना पड़ता है.
एमाइल दुर्खीम की थ्योरी आज लगभग 128 साल बाद भी प्रासंगिक है कि आत्महत्या सामाजिक समस्या है.
कितना अकेला हो गया होगा हरदीप और उन का परिवार जो बिलकुल सांसें उखड़ते वक्त ही अपनी मौत की खबर नजदीकी रिश्तेदार को दी. न भी देते तो क्या होता, कुछ घंटों बाद ही परिजन पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाते और ऐसा नहीं होता तो 2-3 दिन बाद दुकान से बदबू आनी शुरू हो जाती और सूचना मिलने पर पुलिस आती, शटर तोड़ती, पंचनामा बनाती, रिपोर्ट लिखती, फिर इन्वेस्टिगेशन करती. कुछ दिनों बाद वह मामले की फाइल क्लोज कर देती.
Diese Geschichte stammt aus der July First 2025-Ausgabe von Sarita.
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