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हस्त रेखा की उत्पत्ति और इतिहास
Sadhana Path
|July 2025
भले ही लोग ज्योतिष पर विश्वास करे न करे लेकिन उसे नाकार नहीं सकते। ज्योतिष शास्त्र की ऐसी ही एक विधा है हस्तरेखा विज्ञान जिसमें हाथों की आड़ी-तिरछी रेखाओं से भविष्य जाना जाता है।
जिन मनुष्यों ने हस्त विज्ञान की खोज की उसे समझा और व्यावहारिक रूप दिया आज भी उनकी विद्वता के ठोस प्रमाण मौजूद हैं। भारत के ऐतिहासिक युग के स्मारक हमें बताते हैं कि रोम एवं यूनान की स्थापना से सौ वर्ष पूर्व इस देश के मनुष्यों ने ज्ञान का इतना अमूल्य भंडार एकत्र कर लिया था कि उसकी सराहना समूचे विश्व में हुआ करती थी और इन्हीं विद्वानों में हस्तरेखा विज्ञान के जन्म दाता भी थे, उन्हीं के बनाये हुए सिद्धांत अन्य देशों में पहुंचे। हस्तरेखा से संबंधित अब तक जितने भी प्राचीन ग्रन्थ पाये गये हैं। उनमें वेद एवं सामुद्रिक शास्त्र सबसे प्राचीन धर्मग्रन्थ है। यही वेद और शास्त्र यूनानी सभ्यता और ज्ञान के मूल स्रोत थे। अत्यन्त प्राचीन युग में इस विज्ञान का प्रचलन चीन, तिब्बत, ईरान और मिश्र जैसे देशों में प्रारम्भ हुआ लेकिन इन देशों में इसमें जो सहयोग स्पष्टता और एकरूपता हमें दिखायी देती है वह वास्तव में भारतीय सभ्यता की देन है। जगत भर में भारतीय सभ्यता को सर्वाधिक उच्च और विवेकपूर्ण माना जाता रहा है। जिसे हम हस्तरेखा विज्ञान या कीरोमेंसी कहते हैं वह भारत के अलावा यूनान में भी पला और पनपा। यूनानी शब्द कीर का अर्थ है जो हांथ से विकसित हुआ हो। उन्नीसवीं शताब्दी में उत्पीड़न की अग्नि में भी सुरक्षित रहकर फेनिक्स ने इस ज्ञान की सुरक्षा के निरन्तर प्रयास किये और जिस विज्ञान को अन्धविश्वास घोषित किया जा चुका था, वह एक बार फिर सत्य बनकर सामने आया । इस प्रकार के अनेक प्रमाण हैं जो इसकी सत्यता को साबित करते हैं कि यह एक सत्य और प्रमाणिक विज्ञान है। ईसा से 423 वर्ष पूर्व यूनानी दार्शन
Diese Geschichte stammt aus der July 2025-Ausgabe von Sadhana Path.
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