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वास्तुशास्त्र से रोगों का निराकरण
Sadhana Path
|May 2025
वास्तु समाधान द्वारा न केवल घर की सुख-समृद्धि में वृद्धि की जा सकती है अपितु इसके द्वारा कई रोगों से बचाव भी संभव है। कैसे करें वास्तु सुधार द्वारा रोगों से बचाव ? जानने के लिए पढ़ें यह लेख ।
वास्तु शब्द, 'वस्तु' शब्द का आधार है, जिसका अर्थ है 'जो है' अथवा 'जिसकी सत्ता है' वही वस्तु है। इसलिए वस्तु से संबंधित शास्त्र को ही वास्तुशास्त्र कहा जाता है। वास्तु का संस्कृत में शाब्दिक अर्थ है- 'मनुष्य तथा देवों का निवास स्थान।'
वास्तुशास्त्र का कार्य केवल भवन निर्माण तक ही सीमित नहीं है बल्कि मंदिरों के विस्तार, शहरी आवास योजनाओं, सड़कों, रेलवे लाइनों, नहरों आदि के निर्माण तक भी है। दक्षिण भारत के अधिकांश मंदिर जैसे तिरुपति में भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर, मदुराई में मीनाक्षी मंदिर, पुट्टा श्री में साई बाबा का भव्य स्थान तथा मध्य प्रदेश में उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर वास्तु पर आधारित है। राजस्थान का गुलाबी शहर जयपुर जो सन् 1772 में महाराज सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा स्थापित किया गया था, वास्तु के सिद्धान्तों द्वारा ही निर्मित है जो वास्तुशास्त्र का उत्कृष्ट नमूना है।
वास्तु पंच महातत्त्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्त्वों के समान रूप से किए गए सम्मिश्रण का नाम है। इसके समानुपातिक मिश्रण से बायो- इलैक्ट्रिक मैग्नेटिक एनर्जी अर्थात् चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव की उत्पत्ति होती है, जिससे मनुष्य को उत्तम स्वास्थ्य, धन और ऐश्वर्य की उपलब्धि होती है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के सभी सजीव व निर्जीव पदार्थों पर अपना प्रभाव रखती है। पृथ्वी तत्त्व से ही जीवन का प्रारंभ होता है। इसलिए पृथ्वी को मां की संज्ञा दी गई है। वही समस्त जीवों व निर्जीवों की जननी है। भवन निर्माण करते समय भूमि पूजन का वास्तविक उद्देश्य यही है। पर्यावरण और वायु मंडल से बाहर की अनन्य शक्तियों का भी पृथ्वी से संबंध है। संपूर्ण सौर मंडल में पृथ्वी ग्रह पर ही जीवन है। पृथ्वी में स्पर्श, ध्वनि, रूप, रस के अतिरिक्त गन्ध के विशेष गुण विद्यमान हैं।
वास्तु में जल एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। जल के बिना जीवन नहीं है। शुद्ध जल के कई सात्विक गुण हैं। संकल्प लेते समय अग्नि और जल को ही साक्षी माना जाता है। जल मानव जीवन में नवचेतना का संचार करता है। वास्तु के अनुसार घर में जल स्थान पूर्व दिशा में होना चाहिए।
इसका निष्कासन सदैव ईशान दिशा में होना चाहिए। इसी तरह पानी का, नल, जल संग्रह तथा छत की टंकी उचित दिशा में होनी चाहिए।
Diese Geschichte stammt aus der May 2025-Ausgabe von Sadhana Path.
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