يحاول ذهب - حر
त्रिक भाव रहस्य - षष्ठ भाव और अभिवृद्धि
February 2025
|Jyotish Sagar
षष्ठ भाव एक ओर तो हमें विभिन्न प्रकार के रोगों और शत्रुओं से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर ऋण अर्थात् कर्ज के लेन-देन के विषय में ताकतवर बनाता है।
जन्मपत्रिका में निहित बारह भावों में वैसे तो सारे भाव अपने आपमें विशेषताएँ लिए हुए होते हैं, परन्तु जन्मकुण्डली का षष्ठ भाव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भाव माना जाता है। वैदिक ज्योतिष ग्रन्थों में षष्ठ भाव को त्रिक भाव, उपचय स्थान, दु:ख स्थान, त्रिषडाय आदि कई नामों से बताया गया है। इस भाव के माध्यम से मुख्य रूप से जिन विषयों पर विचार किया जाता है उनमें प्रमुख हैं, रिपु अर्थात् शत्रु, रोग अर्थात् बीमारी और ऋण अर्थात् कर्ज।
सामान्य रूप से यह देखने में आया है कि जब भी षष्ठ भाव के सम्बन्ध में फलकथन की बात आती है, तो इसे एक दुःस्थान अथवा बुरा भाव समझकर ही फलकथन किया जाता है, जबकि यह पूरा सत्य नहीं है। एक महत्त्वपूर्ण बात सदैव हमें अपने मन-मस्तिष्क में ध्यान रखना चाहिए कि जन्मपत्रिका में कोई भी स्थान बहुत बुरा अथवा बहुत अच्छा नहीं होता है।
वास्तव में जब भी हम ज्योतिष का अध्ययन प्रारम्भ करते हैं, फिर माध्यम चाहे किताबें हों अथवा अन्य सोशल मीडिया, सभी ने षष्ठ भाव को बुरा भाव अथवा दुःस्थान बताया है। प्रारम्भिक स्तर के ज्ञान के आधार पर यह बात सही भी है, लेकिन यह पूर्णरूपेण सही नहीं प्रतीत होती। जब हम थोड़ा गहराई में जाते हैं, तब इसके गूढ़ रहस्य को समझ पाते हैं। वस्तुत: किसी भाव के अच्छे और बुरे होने का निर्णय लेने के पूर्व हमें विचाराधीन विषय अथवा समस्या को भाव के अनुरूप देखने और समझने की आवश्यकता होती है।
हम सभी जानते हैं कि मानव जीवन कर्मफल के सिद्धान्तों पर आधारित होने के साथ-साथ प्रतिपल संघर्षों से घिरा हुआ है। मानव ने कर्म योनि में जन्म लिया है और कर्म करना उसकी अनिवार्यता है। जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धृत किया है...
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (गीता 2/47)
अर्थात् तुम्हें अपने निश्चित कर्मों का पालन करने का अधिकार है, लेकिन तुम अपने कर्मों का फल प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो, तुम स्वयं को अपने कर्मों के फलों का कारण मत मानो और न ही अकर्मा रहने में आसक्ति रखो।
هذه القصة من طبعة February 2025 من Jyotish Sagar.
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