يحاول ذهب - حر
देश में अव्वल मगर दुनिया के आगे फिसड्डी
September 18, 2025
|Business Standard - Hindi
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए शुल्क विश्व व्यापार संगठन के वैश्विक व्यापार सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं। मगर इन शुल्कों के बाद भारत में यह बहस भी छिड़ गई है कि देश वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए क्या कदम उठा सकता है।
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औद्योगिक संगठनों, कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों और वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों ने भूमि अधिग्रहण, बिजली क्षेत्र, कर, अनुपालन संबंधित प्रक्रियाओं और श्रम कानूनों सहित विभिन्न क्षेत्रों में अगले चरण के सुधार करने का अनुरोध किया है। ये सुधार कारोबार संचालन आसान बनाने के साथ ही भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की बुनियादी क्षमता भी बढ़ाएंगे। इस बीच, नीति-निर्माताओं के कुछ अपने विचार हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का 1.4 अरब लोगों का मजबूत घरेलू बाजार एक सहज एवं आरामदेह क्षेत्र बन गया है और भारतीय उद्योग जगत को मोटा मुनाफा भी दे रहा है इसलिए उन्हें दुनिया में अवसरों की तलाश में निकलने की जरूरत महसूस नहीं होती है। गोयल की टिप्पणी केवल उनकी नाराजगी या तंज बता कर खारिज नहीं की जा सकती। काफी हद तक यह सच है कि बड़े भारतीय विनिर्माण आधारित औद्योगिक घराने निर्यात बढ़ाने के जोरदार प्रयास करने के बजाय कई तरह के उद्योगों में उतरने और घरेलू बाजार में विस्तार में अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं। कई भारतीय ब्रांड की दुनिया में अच्छी खासी पहचान है मगर वे दुनिया की नामी कंपनियों की फेहरिस्त में शुमार नहीं हैं। कुछ मायनों में इसका संबंध 1991 के आर्थिक सुधारों से पूर्व की व्यावसायिक नीतियों से है। तब सरकार सभी व्यावहारिक उद्देश्यों से यह तय करती थी कि कोई कंपनी कितना उत्पादन कर सकती है। प्रतिकूल परिस्थितियों के दौरान सरकार यह भी तय करती थी कि कोई कंपनी किस क्षेत्र में कारोबार करने के लिए उतर सकती है, उसमें कितनी इकाइयां हो सकती हैं। सरकार यह भी तय करने से पीछे नहीं हटती थी कि कंपनियां किस कीमत पर बाजार में अपने उत्पाद बेच सकती हैं। हालांकि, ऐसे दौर भी आए जब सरकार की तरफ से अधिक हस्तक्षेप नहीं हो रहे थे मगर भारतीय औद्योगिक घरानों को तब तक लाइसेंस का प्रबंधन करने की आदत लग चुकी थी। वे जो भी उत्पादन करते
هذه القصة من طبعة September 18, 2025 من Business Standard - Hindi.
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