يحاول ذهب - حر
जब अच्छा बन जाए बुरा...
January 2026
|Aha Zindagi
साफ़-सफ़ाई, व्यवस्था और सतर्कता अच्छी आदतें हैं, पर क्या हो जब ये अनियंत्रित हो जाएं और जीवन ही मुश्किल बना दें? ऐसी स्थिति ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर कहलाती है।
प्रचलित भाषा में ओसीडी कहे जाने वाले इस मनोरोग के दायरे में कई अन्य तरह के विचार और व्यवहार भी आते हैं।
इस बार ताना-बाना में जीवन के हर क्षेत्र के ताने-बाने को प्रभावित करने वाले इस मनोरोग का परिचय।
'कोई भी वस्तु बिलकुल अनुपयोगी नहीं होती, आख़िर कबाड़ की चीजें भी कभी काम आ ही जाती हैं।'
'गंदगी और रोगों से बचने के लिए साफ़-सफ़ाई रखना बहुत ज़रूरी है।'
'चीजें व्यवस्थित होनी चाहिए, बेतरतीबी में किसको अच्छा लगता है!'
ये लगते तो निरापद विचार हैं, और हैं भी, लेकिन एक सीमा के बाद ये रोग का रूप ले लेते हैं। जैसे, सफ़ाई रखना अच्छी बात है, लेकिन दिन में पांच बार नहाना या चार बार कपड़े बदलना सामान्य नहीं है। खाने से पहले हाथ अवश्य धोने चाहिए, लेकिन अगर कोई चार बार साबुन लगाए, दस मिनट तक हाथ रगड़ता रहे या हाथ के साथ हर बार नल की टोंटी वगैरह भी धोए तो यह असामान्य है। इसी तरह, किताबें एक विशेष क्रम में न जमी हों, चादर पर दो-चार सिलवटें हों और इतने में ही किसी का पारा चढ़ जाए या वह तनाव में आ जाए, सारे काम छोड़कर उन्हें 'ठीक' करने लगे तो यह व्यवस्था नहीं, दिमाग़ की अव्यवस्था है।
ये सारे लक्षण ओसीडी के हैं। दुनिया में सबसे ज़्यादा होने वाला मनोरोग। निरक्षरों और निर्धनों से लेकर बड़े-बड़े अमीर, सफल लोग और खूब पढ़े-लिखे भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति को बार-बार अवांछित विचार आते हैं और उनसे छुटकारा पाने के लिए वह कुछ ख़ास काम बार-बार करता है।
ख़तरे की घंटी हैं दो चीजें
जैसा कि इस बीमारी के नाम से ही स्पष्ट है, इसके दो मुख्य लक्षण हैं: ऑब्सेशन और कंपल्शन। मनोरोग विज्ञान के अनुसार 'ऑब्सेशन' वैसे विचार हैं जो बार-बार आते रहते हैं और रोकने की कोशिश के बावजूद नहीं रुकते हैं। ये व्यक्ति के अपने ही विचार होते हैं। उसे पता होता है कि ये विचार फ़िज़ूल और बेमतलब हैं, परंतु चाहकर भी वह उनको मन से हटा नहीं पाता।
هذه القصة من طبعة January 2026 من Aha Zindagi.
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