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खेती और खाद सुरक्षा की नई चुनौतियां
Jansatta Lucknow
|February 17, 2026
भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में अनाज उत्पादन में थोड़ी-सी भी कमी व्यापक प्रभाव डाल सकती है। इसलिए यूरिया जैसी बुनियादी कृषि सामग्री को लेकर तय की गई किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल बजट संतुलन के नजरिए से नहीं किया जाना चाहिए।
भारतीय कृषि व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले यूरिया उर्वरक को लेकर केंद्र सरकार के हालिया निर्णय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आदेश के तहत यूरिया की बोरी का वजन 50 किलो से घटा कर 40 किलोग्राम कर दिया गया है।
इसके साथ ही यूरिया में नाइट्रोजन की मात्रा भी 46 से घटा कर 36 फीसद कर दी गई है। सरकार इसे सुधारात्मक कदम के रूप में पेश कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस निर्णय ने किसानों की लागत बढ़ा दी है और कृषि उत्पादन तथा देश की खाद्य सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
यूरिया खेती में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। गेहूं, धान और मक्का जैसी उच्च उत्पादकता वाली फसलों की उपज काफी हद तक नाइट्रोजन की उपलब्धता पर निर्भर करती है। यह पौधों की बढ़वार, पत्तियों के विकास और दाने भरने की प्रक्रिया के लिए अनिवार्य तत्त्व है। ऐसे में यूरिया के स्वरूप में किया गया कोई भी बदलाव सीधे तौर पर फसलों की पैदावार, किसानों की आय और अंततः उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। सरकार के नए फैसले के बाद यूरिया की एक बोरी में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा में भारी गिरावट आई है। पहले 50 किलो की बोरी में 46 फीसद नाइट्रोजन के हिसाब से लगभग 23 किलो नाइट्रोजन उपलब्ध होती थी। अब 40 किलो की बोरी में 36 फीसद नाइट्रोजन के साथ यह मात्रा घट कर केवल 14.4 किलो रह गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि किसान को उतनी ही नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक यूरिया खरीदना पड़ेगा।
Bu hikaye Jansatta Lucknow dergisinin February 17, 2026 baskısından alınmıştır.
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