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परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य
Jansatta Lucknow
|January 21, 2026
परिवर्तन को अपनाना व्यक्तित्व के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
मनुष्य का जीवन गतिशील है और यह समय, परिस्थिति, अनुभव और परिवेश के साथ लगातार बदलता रहता है। जो व्यक्ति इस स्वाभाविक प्रक्रिया को समझकर उसे अपनाता है, वही निरंतर विकास कर पाता है। वहीं, जो परिवर्तन का विरोध करता है, उसकी सोच और व्यक्तित्व वहीं रुक जाते हैं। वे नवीन संभावनाओं से कट जाते हैं। जीवन में सफलता, सम्मान, नई संभावनाओं और मानसिक परिपक्वता का दरवाजा तभी खुलता है, जब हम नई परिस्थितियों को स्वीकार करके आगे बढ़ते हैं।
मनुष्य के विकास की यात्रा बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक परिवर्तन की ही श्रृंखला है। बचपन में जहां मासूमियत और सीखने की प्रवृत्ति होती है, वहीं युवावस्था में महत्वाकांक्षा, चुनौतियां और संघर्ष सामने आते हैं। फिर धीरे-धीरे परिपक्व होकर जीवन के गहरे अर्थ समझ में आते हैं। अगर हम इस यात्रा में पुराने अनुभवों को थामे रहते और नई परिस्थितियों को नकारते, तो सीखने और बढ़ने की प्रक्रिया वहीं थम जाती। इसका अर्थ यह है कि व्यक्तित्व का निर्माण तभी होता है, जब हम हर बदलाव को अवसर मानकर उसे आत्मसात करते हैं।
बदलाव को अपनाने का पहला कदम मानसिक लचीलापन है। जब कोई नई स्थिति हमारे सामने आती है, तो प्रारंभ में भय और असुरक्षा की भावना स्वाभाविक होती है। यह याद रखना चाहिए कि कोई भी नया अनुभव हमें या तो सफलता देगा या सीखने का अवसर। उदाहरण के लिए, तकनीक में आए बदलाव ने कार्य करने का ढंग पूरी तरह बदल दिया। जो लोग समय के साथ नई तकनीकों को अपनाते रहे, वे न केवल पेशेवर रूप से आगे बढ़े, बल्कि जीवन को भी सरल बना पाए।
Bu hikaye Jansatta Lucknow dergisinin January 21, 2026 baskısından alınmıştır.
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