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वॉरेन बफेट से ज्यादा लाभ दे रही 'मेटल किंग' अनिल की कंपनी, 20 देशों में इनका कारोबार

Dainik Bhaskar Satna

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July 04, 2025

बात 1973 की है। तब वे युवा थे। उम्र 19 साल थी। हाथ में एक टिफिन बॉक्स और एक बिस्तर लेकर वे पटना से मुंबई पहुंचे। तब उन्होंने पहली बार मुंबई की काली-पीली टैक्सी और डबल डेकर बस देखी थी, पर आंखों में सपने बड़े थे। इसलिए व्यापार की कोशिश शुरू की। हालांकि शुरुआती संघर्ष इतना ज्यादा रहा कि 10 में से 9 बिजनेस असफल रहे। लेकिन दसवें प्रयास में उन्हें बड़ी सफलता मिली। यह शख्स हैं वेदांता ग्रुप के संस्थापक अनिल अग्रवाल, जिन्हें आज दुनिया 'मेटल किंग' के रूप में पहचानती है।

19 साल की उम्र में वे स्क्रैप व्यापारी बन चुके थे। 1976 में करीब 22 साल की उम्र में दोस्तों, रिश्तेदारों से कुछ उधार और बैंक से लोन लेकर करीब 16 लाख रुपए में शमशेर स्टर्लिंग कॉर्पोरेशन खरीदा। यह कंपनी एनामेल्ड कॉपर बनाती थी। इसके बाद 1986 में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज की स्थापना की। यह भारत की पहली निजी टेलीकॉम केबल बनाने वाली कंपनी थी, लेकिन असली छलांग तब लगी जब उन्होंने घाटे में चल रही बाल्को व हिंदुस्तान जिंक जैसी सरकारी कंपनियों को खरीद कर उनका कायाकल्प कर दिया। 2003 में उन्होंने लंदन में वेदांता रिसोर्सेज की स्थापना की, जो फाइनेंशियल टाइम्स स्टॉक एक्सचेंज100 में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय मूल की कंपनी बनी। आज वेदांता की उपस्थिति भारत सहित 20 से अधिक देशों में है। हाल ही में जारी कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उनके वेदांता समूह ने कुछ मामलों में महान निवेशकों में शामिल वॉरेन बफेट की कंपनी बर्कशायर हैथवे से भी ज्यादा लाभ दिया है।

चर्चा में क्यों- वेदांता की डीमर्जर योजना 2025 के लिए कंपनी को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल से बड़ी राहत मिली है।

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