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राज्यों के व्यय में गुणवत्ता का संकट

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December 16, 2025

लोकलुभावन योजनाओं और निःशुल्क वस्तुएं या सेवाएं बांटने से गरीब लोगों के सशक्तीकरण की जगह सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर प्रतिकूल परिणाम सामने आ सकते हैं। बता रहे हैं एम गोविंद राव

- एम गोविंद राव

भारत के राजकोषीय संघवाद में सामाजिक सेवाएं प्रदान करना राज्यों का मुख्य उत्तरदायित्व है। आर्थिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं।

मगर बात जब राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन के मूल्यांकन की होती है तो ध्यान हमेशा उनके घाटे और कर्ज पर रहता है और उनके सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता है। वास्तव में, हाल के वर्षों में सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता तेजी से घटी है क्योंकि सब्सिडी और नकद अंतरण लोगों को सशक्त बनाने और उन पर होने वाले व्यय के लिए गुंजाइश कम कर देते हैं। सभी राजनीतिक दल अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए अधिक से अधिक लोकलुभावन वादे करने के साथ मुफ्त में चीजें बांट रहे हैं जिनसे भौतिक और मानव पूंजी दोनों के लिए आर्थिक संसाधन कम पड़ जाते हैं।

टिकाऊ राजकोषीय प्रबंधन के लिए घाटा और कर्ज नियंत्रित करना निश्चित रूप से जरूरी है। हालांकि, विकेंद्रीकरण सिद्धांत का मूल आधार यह है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता और राजस्व का पुनर्वितरण मुख्य रूप से केंद्र सरकार का (लेकिन केवल उसका नहीं) दायित्व है। संविधान निर्माताओं को इस बात का एहसास था इसलिए उन्होंने राज्यों के कर्ज लेने के प्रबंधन के लिए एक ढांचा तैयार किया। अनुच्छेद 293 (3) के अनुसार अगर राज्य केंद्र सरकार से पहले कोई

ऋण ले चुके हैं तो अतिरिक्त उधार के लिए उन्हें केंद्र से अनुमति लेनी होगी। हालांकि, 12वें वित्त आयोग ने केंद्र सरकार को वित्तीय मध्यस्थता से दूर रहने का सुझाव दिया मगर केंद्र सरकार मध्यस्थता करने से पीछे नहीं हट रही है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पूंजीगत व्यय के लिए राज्यों को शून्य ब्याज दर पर दिए गए दीर्घकालिक केंद्रीय ऋण हैं। राजकोषीय प्रबंधन कानून के तहत राज्यों के लिए राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3 फीसदी तक सीमित रखना है इसलिए अब केंद्र सरकार को कर्ज की सीमा तय करनी होती है। बेशक, कुछ राज्य बजट से इतर उधारी का दायरा बढ़ाने के लिए दबाव डालते हैं मगर सीमा निर्धारित करने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर केंद्र सरकार की है।

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