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हिंदी प्रकाशन का नया अध्याय

Outlook Hindi

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October 27, 2025

एक पुराने उपन्यास ने बताया कि नए पाठक भी पुराने लिखे हुए पर हुए दोबारा मुग्ध हो सकते हैं

- विमल कुमार

हिंदी प्रकाशन का नया अध्याय

कुछ दिन पहले रायपुर में हिंदी के यशस्वी लेखक विनोद कुमार शुक्ल को 30 लाख रुपये की रॉयल्टी मिलने से विवाद खड़ा हो गया। हिंदी के कुछ लेखक इस हैरतअंगेज घटना पर जहां एक तरफ जश्न मना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लेखक इस रॉयल्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं।

आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि प्रेमचंद को उनके उपन्यास रंगभूमि पर 1800 रुपये की रॉयल्टी मिली थी। रंगभूमि 1925 में छपी थी। यानी आज से सौ साल पहले। उस समय के 1800 रुपये आज के हिसाब से कम से कम एक लाख 80 हजार तो जरूर हो गए होंगे। इतनी बड़ी रकम उस जमाने में सब लेखकों को नसीब नहीं थी। मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती प्रेमचंद के गोदान से अधिक बिकी थी। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' का चंद हसीनों के खुतूत और दिल्ली का दलाल अपने समय के बेस्ट सेलर थे। भगवती चरण वर्मा का 1934 में प्रकाशित उपन्यास चित्रलेखा बाद में इतना बिका कि आजादी के बाद भगवती बाबू का जीवन उसकी रॉयल्टी के सहारे निकल गया।

लेकिन इसके बावजूद उस जमाने में भी लेखकों की रॉयल्टी प्रकाशक मार लेते थे। शिवरानी देवी ने प्रेमचंद घर में लिखा। अगर प्रकाशकों ने प्रेमचंद को सही रॉयल्टी दी होती, तो उन्हें जीवन में इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। खुद शिवपूजन बाबू ने अपनी डायरी में लिखा है कि पुस्तक भंडार के मालिक प्रकाशक रामलोचन शरण और उनके मित्र प्रकाशक राजा राधिकरामण प्रसाद सिंह ने उनकी पूरी रॉयल्टी नहीं दी।

निराला को भी उनकी रॉयल्टी का पूरा हक जीते जी नहीं मिला अन्यथा उनकी यह हालत नहीं हुई होती। प्रेमचंद इस समस्या को जान गए थे और खुद प्रकाशक बनकर उन्होंने हंस प्रकाशन शुरू किया और अपनी पत्नी के कहानी संग्रह भी इसी प्रकाशन से छापे।

आजादी के बाद प्रकाशकों से शायद रॉयल्टी न मिलने के कारण ही यशपाल, जैनेन्द्र, दिनकर, उपेंद्रनाथ अश्क, राजेन्द्र यादव भी खुद अपनी किताबें छापकर प्रकाशक बन गए थे। यह अलग बात है कि वे प्रकाशक के बजाय लेखक बने रहे और उन्हें इस धंधे में पर्याप्त सफलता नहीं मिली।

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