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परदे पर अमर बगावत

Outlook Hindi

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October 27, 2025

भगत सिंह की 118वीं जयंती पर यह याद करना मौजू है कि क्यों आजादी की लड़ाई का यह महानायक परदे, रंगमंच, नुक्कड़ नाटकों, प्रदर्शनों, गीतों और गली-कूचों में अपने अलग-अलग रूपों और वैचारिक आग्रहों के साथ जगाता रहता है दिलचस्पी

- साक्षी सलिल चौहान

परदे पर अमर बगावत

भगत सिंह को महज ऐतिहासिक शख्सियत नहीं, बल्कि राष्ट्र के पर्याय के रूप में याद किया जाता है। बीसवीं सदी के इस युवा क्रांतिकारी को दशकों से अलग-अलग रूपों में चित्रित किया गया, जिसे मात्र 23 साल की उम्र में 1931 में फांसी दे दी गई थी। उनकी तिरछी टोपी, घनी मूंछें और फांसी के तख्त तक नंगे पांव जाना, उनके क्रांति गीत सब एक प्रतीक और प्रेरणास्त्रोत हैं। लेकिन रंगमंच, नुक्कड़ नाटकों और रुपहले परदे पर तो वे बार-बार कई रूपों में पेश किए जाते रहे हैं। उन पर सबसे ज्यादा फिल्में बनीं और यह सिलसिला चलता ही जा रहा है। दरअसल, आजादी की लड़ाई के किसी दूसरे महानायक को इतना विपुल सिनेमाई जीवन नहीं मिला। फिल्मों, नाटकों, गीतों और वृत्तचित्रों में वे बार-बार पुनर्जन्म लेते रहे।

गौरतलब यह भी है कि परदे पर अतीत और इतिहास की विवादास्पद और भड़काऊ प्रस्तुतियों के दौर में भी भगत सिंह देशभक्त, समाजवादी, नास्तिक या रोमांटिक नायक की छवि बदस्तूर कायम है। उनकी जयंती (28 सितंबर) पर यह पूछना मुनासिब है कि सिनेमाई परदे पर भगत सिंह की कथा के बार-बार लौट आने की वजह क्या है। वह क्या दिलचस्पी है, जो उन्हें इस दौर में भी मौजू बनाए हुए है, जब सहमतियां बेहद ध्रुवीकृत और असहमतियां विभाजित हैं।

imageमनोज कुमार की ब्लैक ऐंड ह्वाइट फिल्म शहीद (1965) ने दर्शकों के दिल में भगत सिंह के प्रति एक मायने में भक्तिभाव जगाया। यानी ऐसा नायक जो आजादी के बाद राष्ट्रवादी भावनाओं के चश्मे में समाहित है। 'मेरा रंग दे बसंती चोला' गाने ने उन्हें रोमांटिक, वीर और यादगार प्रतीक बना दिया। लेकिन मार्क्सवादी और नास्तिक भगत सिंह उसमें लगभग नदारद थे, जिनके लेख क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव की वकालत करते थे। दर्शकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। तब सिनेमा में राष्ट्र-निर्माण की धारा बह रही थी, समाजशास्त्रीय चीर-फाड़ नहीं।

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