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मन, कर्म और वचन में शिव
Rupayan
|February 21, 2025
महाशिवरात्रि पर उपवास, ध्यान और पूजा करने से मन, शरीर और आत्मा का शुद्धिकरण होता है। शिव पूजा के दौरान जब साधक का मन, कर्म और वचन एक सूत्र में रस्सी की तरह गुंथ हैं, तब शिव-शक्ति उसकी इच्छित कामना को पूरा करते हैं।
सृजन और संहार एक-दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। द्वंद्वात्मक प्राकृतिक ऊर्जा ही जीवन का आधार है, जिसे महाशिवरात्रि पर आत्मसात कर दुखों को सुख में परिवर्तित किया जा सकता है। इसलिए महाशिवरात्रि का उत्सव भक्तों से लेकर साधारण गृहस्थ, सभी के लिए अतिमहत्वपूर्ण है। प्रकृति में दिन-रात, गर्मी- सर्दी जैसी द्वंद्वात्मकताओं का संतुलन जीवन के लिए आवश्यक है। शिव-शक्ति, अर्धनारीश्वर रूप की वैज्ञानिकता यह प्रमाणित करती है कि विपरीत तत्वों में भी एक अदृश्य एकता निहित है, जो सृष्टि की समग्र रचना को स्थायित्व प्रदान करती है। शिव संहार के देवता हैं, जबकि शक्ति सृजन की देवी हैं। संहार और सृजन भले ही एक-दूसरे के विपरीत लगें, मगर दोनों विपरीत गुण पुरुष और स्त्री एक ही अस्तित्व में संतुलित रूप से विद्यमान हैं। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर तर्क के रूप में पुरुष गुण और भावना के रूप में स्त्री गुणका संतुलन मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसलिए महाशिवरात्रि पर शिव-शक्ति का ध्यान, व्रत, पूजन महिलाओं के लिए भी परम उपयोगी है। महाशिवरात्रि के दिन अनुष्ठान एवं शिव जी की पूजा तथा व्रत कुंवारी कन्याओं की मनचाहा वर पाने की इच्छा की पूर्ति करता है और विवाहित स्त्रियों के सौभाग्य सुख में वृद्धि लाता है। प्रत्येक स्त्री को चाहिए कि वह घर-परिवार की सुरक्षा एवं मनोकामना पूर्ति के लिए महाशिवरात्रि पर्व पर व्रत, पूजा, उपासना अवश्य करे, ताकि शिव-शक्ति की कृपा से समस्याओं का समाधान एवं दुखों का निवारण हो सके। महाशिवरात्रि पर उपवास, ध्यान और पूजा करने से मन, शरीर और आत्मा का शुद्धिकरण होता है। यही आंतरिक शक्ति, शांति का स्रोत बनकर नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक है। जब महाशिवरात्रि पर शिव पूजा दौरान साधक का मन, कर्म और वचन एक सूत्र में रस्सी की तरह गुंथ जाते हैं, तब शिव-शक्ति उसकी इच्छित कामना को पूरा करते हैं।
■ ग्रहों का संयोग
Bu hikaye Rupayan dergisinin February 21, 2025 baskısından alınmıştır.
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