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गुप्पी की शीतकालीन यात्रा

Champak - Hindi

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January Second 2024

गुप्पी गिलहरी ने कड़ी मेहनत कर के सर्दियों के लिए मेवे जमा किए थे. उन का पैकेट बना कर वह रखने ही जा रही थी कि चैन्नई से उस की बचपन की सहेली कोको गिलहरी का फोन आया.

- वंदना गुप्ता

गुप्पी की शीतकालीन यात्रा

"कैसी हो गुप्पी? क्या कर रही हो?” कोको ने पूछा.

“कोको, आज मैं बहुत खुश हूं. मैं ने सर्दियों के लिए काफी मेवे इकट्ठे कर लिए हैं. अब चाहे मौसम कितना भी खराब क्यों न हो, कितनी भी ठंड क्यों न पड़े मैं आराम से घर में बैठ कर इन्हें खा सकत हूं,” गुप्पी ने मुसकराते हुए कहा.

"इस का मतलब तुम इन सर्दियों में भी मेरे पास नहीं आ रही हो. कितनी बार कहा है कि दिल्ली की सर्दी में मत ठिठुरती रहा करो, चैन्नई आ जाओ, यहां का मौसम बहुत प्यारा है. वैसे भी तुम्हें देखे हुए कितने दिन हो गए हैं, यदि इस बार तुम नहीं आई तो मैं तुम से कभी बात नहीं करूंगी,” कोको ने नाराज होते हुए कहा.

“अच्छा ठीक है, तुम नाराज न हो. मैं इन सर्दियों में तुम्हारे पास आने का प्रोग्राम बनाती हूं,” गुप्पी बोली.

“हुर्रे,” कोको खुशी से चिल्लाई.

गुप्पी ने चैन्नई जाने की तैयारी शुरू कर दी. जैसे ही सर्दी शुरू हुई, वह अपना सामान ले कर चैन्नई के लिए निकल पड़ी.

स्टेशन उस के घर से काफी दूर था. वह स्टेशन पहुंचने ही वाली थी कि उस ने सोचा, 'चैन्नई में तो सर्दी नहीं होगी, वहां मेवा खाना ठीक नहीं रहेगा, वह मेवे का पैकेटे बेकार लाद कर लाई. अब यदि इसे घर रखने जाऊंगी तो ट्रैन छूट जाएगी, क्यों न इसे यहीं कहीं छिपा दूं, लौटते समय ले जाऊंगी.'

उस ने चारों ओर नजर दौड़ाई. एक जगह उसे 3-4 ऐसे पेड दिखाई दिए, जिन में एक भी पत्ता नहीं था, केवल टहनियां ही थीं.

‘इन पेड़ों को पहचानने में मुझे आसानी होगी, ' उस ने सोचा और उन में से एक पेड़ के नीचे जमीन खोद कर मेवे का पैकेट छिपा दिया. पहचान के लिए उस पेड़ की एक डाली पर उस ने अपना नीला रिबन बांध दिया.

“बच्चो, तुम इस तने को क्यों छील रहे हो?” गुप्पी ने पूछा.

"हम इस पर अपना नाम लिख रहे हैं, हमारी शर्त लगी है, जो सब से पहले नाम लिखेगा, वही फर्स्ट आएगा,” चूहों ने बताया.

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