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गांधी : एक अभिनव मूल्यांकन
Kendra Bharati - केन्द्र भारती
|Kendra Bharati - August 2022 Issue
५ फरवरी, १६२५ को "यंग इण्डिया' में गांधीजी ने एक महाशय का पत्र और उसका उत्तर छापा । पत्र-लेखक द्वारा लिखा गया था- "आप हर वक्त हमसे कहते हैं कि मुसलमानों के सामने झुको। उनके विरुद्ध अदालत भी कदापि मत जाओ। अच्छा बताइए हमारी ही जमीन पर हमसे पूछे बिना ही कोई मस्जिद बनाने लगे तो हम क्या करें?"
इस पर गांधीजी ने उत्तर दिया "अगर 'अ' का कब्जा जमीन पर है, और कोई शख्स उस पर इमारत बनाता है तो वह इमारत चाहे मस्जिद ही है, तो 'अ' को यह अधिकार है कि वह उस मजिस्द को या जो भी इमारत हो, उसे गिरा दे। बिना पूछे किसी की जमीन पर इमारत खड़ी करना सरासर डाकेजनी है। अगर ऐसी इमारत को उसे गिराने की ताकत नहीं है, तो न्यायालय की मदद से उसे गिरवा सकता है। मूल बात यह है कि जब तक मेरे कब्जे में कोई मिल्कियत है, तब तक उसकी हिफाजत जरूरी है। ऐसी हिफाजत भुजबल से हो सकें, तो भुजबल से करें, अदालत जाना पड़े तो अदालत जाए।"
५ फरवरी, १६२८ को रावलपिण्डी में मुसलमानों द्वारा सताए गए हिन्दुओं की एक सभा में गांधीजी ने कहा "मेरे विचार से पैसे की खातिर् या जान की खातिर अपनी इज्जत-आबरू खोकर जीना तो जीना नहीं है, वह तो मरने के बराबर है। (सम्पूर्ण गांधी गांधी वाङमय, खण्ड २६, विषय क्र. ३७) इसी अवसर पर गांधीजी ने आगे कहा, "मुसलमान कभी किसी स्त्री को भगा ले जाते हैं, और उसको मुसलमान बना लेते हैं । वह न तो कुरान जानती न कलमा पढ़ सकती, वह तो हिन्दू स्त्री है। भला वह इस तरह से मुसलमान कैसे हो गई? मैं यह कतई नहीं चाहता हूँ कि किसी हिन्दू स्त्री से जोर-जबर्दस्ती की जाए, यह मेरे लिए असह्य है। मुसलमान बताए कि क्या उनके धर्म में किसी की पत्नी को भगाने और मुसलमान बनाने की शिक्षा दी गई है।”
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