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जिएं जिंदगी 60 के बाद भी
Sadhana Path
|May 2024
जब पूरी जिंदगी एक स्वाभिमान और रौब के साथ जीते हुए गुजारी हो तो जीवन-संध्या में क्यों किसी पर इस तरह से निर्भर हो जाएं कि बुढ़ापा बेबसी में बदल जाए। जब तक जिएं, जिंदगी से भरपूर रहिए।
अभी गर्मी की छुट्टियों में मायके गई तो मन किया रमा आंटी से मिलकर आऊं, काफी दिन से नहीं मिली थी। आंटी से जान-पहचान बहुत समय से है, असल में पापा व अंकल एक ही विभाग में इंजीनियर थे, इसलिए 2-3 बार पोस्टिंग एक ही जगह होने से साथ-साथ रहना हुआ। आंटी का व्यक्तित्व मुझे शुरू से ही अच्छा लगता था। बाहरी दिखावे से दूर अपने सीमित साधनों में ही खुश रहती थीं, उनकी बातें, उनके कर्म स्पष्ट व आशावादी हुआ करते थे, जिससे सबके बीच अलग ही पहचान बनी हुई थी। खैर!
आंटी के घर जाकर उनसे मिल बड़ा ही अच्छा लगा, उनकी बेटी की तो शादी हो गई। थी पर बेटा-बहू सब साथ में ही थे। बातोंबातों में मुझे महसूस हुआ आंटी अपनी बहू की कुछ ज्यादा ही तारीफ कर रही हैं और जो बाहरी-घरेलू कार्य शायद आंटी करती होंगी, उनके भी करने का श्रेय बहू को दे रही थीं। मुझसे भी बोलीं, 'अब घर-बाहर का कुछ अता-पता नहीं रहता श्वेता ही संभालती है। मैं ही इससे पूछ-पूछकर सब काम करती रहती हूं। कहीं आना-जाना हो, लेना-देना हो, वह इसी की जिम्मेदारी है, रिश्ते-नाते सब यही निभा रही है। हां, अगर कहीं जरूरी जाना होता है, तभी जाती हूं, वरना श्वेता ही इधर-उधर का काम निपटा लेती है। भई, अब हमने तो सोच-समझ लिया बेटा-बहू को ही जब सारा कामकाज देखना है, यही घर के मालिक कर्ता-धर्ता हैं तो क्यों हम बीच में अपना वर्चस्व रखें। जैसा भी ये कर रहे हैं, निभा रहे हैं, सब सही है। मैं और तुम्हारे अंकल तो बस। इनकी राय से सहमत हुए रहते हैं। इसी से घर में सुख-शान्ति बनी रहती है। वैसे भी हम अब बुढ़ापे की ओर हैं। कब हाथ-पैर चलने बंद हो जाए पता नहीं, इसलिए पहले से ही हर बात में हस्तक्षेप किए बिना अपनी सलाह-मशविरा दिए बिना चुपचाप सब देखते-भालते रहो, वही अच्छा है। बेटा-बहू जरूरत मुताबिक खैर खबर लेते रहें, हमारी पूछताछ करते रहे, बुढ़ापे के दिन भलीभांति कट जाए इतना ही हमारे लिए बहुत है।
This story is from the May 2024 edition of Sadhana Path.
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