फीमेल इन्फ्लुएंसर्स - Inclusivity for Women
Vanitha Hindi|March 2024
इन्फ्लुएंसर्स या कंटेंट क्रिएटर्स की आज अपनी इंडस्ट्री है। डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री होते हुए भी बॉलीवुड या टीवी की दुनिया से अलग है। साल 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम इंस्पायर इंक्लूजन है। यानी हर उम्र, बॉडी इमेज और हर रंग नस्ल की महिलाओं की विविधता को स्वीकार करना और उन्हें उनकी पहचान बनाने की जगह देना। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने हर उम्र व तबके की महिलाओं को मंच प्रदान किया है। अगर आप में टैलेंट है और आपके पास मोबाइल है तो आप अपने पैशन को फॉलो करते हुए स्टार बन सकती हैं। डिजिटल इंड्स्ट्री महिलाओं को सिर्फ नाम या पहचान नहीं प्रदान कर रही, बल्कि एक स्टेबल इनकम का रास्ता भी दिखा रही है। छोटे से फोन में हर किस्म के टैलेंट की स्ट्रीमिंग के लिए जगह है। रील्स या शॉर्ट वीडियोज के रूप में ब्यूटी, फूड, फिटनेस, फैशन, फाइनेंस, कॉमेडी, कोरियोग्राफी से लेकर ट्रेवल तक आपका कन्टेंट कुछ भी हो सकता है।
परिवा
फीमेल इन्फ्लुएंसर्स - Inclusivity for Women

द मीशा अग्रवाल शी

मीशा अग्रवाल, दिल्ली, 369K

मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में पली-बढ़ी हूं। हाल ही में अपनी बहनों के पास दिल्ली शिफ्ट हुई। साल 2017 से मैं कंटेंट बना रही हूं। अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी की लेकिन मुझे हमेशा से कंटेंट क्रिएटर बनना था। मेरी फैमिली बहुत सपोर्टिव है। मेरी दोनों बहनों ने एमबीए किया है। मेरे पैशन को मेरी मां ने हमेशा सपोर्ट किया।

आपका कंटेंट यूथ में बहुत पॉपुलर है, आपने ये सफर कैसे तय किया?

मुझे 16 की उम्र से ही अपना एक शो करने का मन था। पढ़ाई के साथ मैं कोशिश करती थी कि अपना कुछ लिखूं और वीडियो बनाऊं। हालांकि इसे इतना पसंद किया जाएगा, यह मुझे नहीं पता था। दोस्तों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया। उन्हें मेरा लिखा अच्छा लगता था। मेरी मां ने मुझे यूट्यूब से इंट्रोड्यूस करवाया था। मुझे नहीं पता था कि मैं इसे फुल टाइम कैरिअर बना सकती हूं।

आपका कंटेंट बहुत रिलेटेबल है। अपने कंटेंट के लिए आप प्रेरणा कहां से लाती हैं और कितना मुश्किल है कॉमेडी पीस लिखना? 

मेरे कंटेंट के लिए इंस्पिरेशन तो घर से ही मिलती है। मेरे घर पर सभी मुझे ट्रोल करते रहते हैं। मेरे कंटेंट में सभी जोक्स रीअल होते हैं इसलिए रिलेटेबल लगते हैं। अपने अनुभवों को लिखना जितना आसान लगता है, उतना होता नहीं। एक छोटे से वीडियो के लिए भी स्क्रिप्ट लिखना आसान नहीं होता और इसमें कई बार पूरा-पूरा दिन लग जाता है। मैं अकेले ही काम करती हूं। मेरी कोई टीम नहीं है। लिखना, शूट करना और एडिटिंग... यह सब करने में मेहनत और वक्त लगता है।

पहले इन्फ्लुएंसर्स को और इस शब्द को भी हलके में लिया जाता था। अभी भी कई घरों में इसे कैरिअर के रूप में नहीं देखा जाता है। क्या इसमें कोई बदलाव आया है? 

This story is from the March 2024 edition of Vanitha Hindi.

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