हम झूठ क्यों बोलते हैं
Grihshobha - Hindi|July First 2021
जिंदगी के कई मौके ऐसे होते हैं जब लोग बिना वजह झूठ बोलते हैं. मगर ऐसी नौबत आती क्यों है, यह जानना काफी दिलचस्प है...
मीनी सिंह

झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो...' बचपन में हमें सिखाया गया था. मगर फिर भी हम झूठ

बोलते हैं, रोज बोलते हैं. कहते हैं किसी भी रिश्ते में झूठफरेब नहीं होना चाहिए, नहीं तो यह उस रिश्ते को तबाह कर देता है. फिर भी हम झूठ बोलते हैं और छोटीछोटी बातों पर बोलते हैं. कभीकभी जरूरत नहीं है, फिर भी झूठ बोलते हैं.आखिर क्यों?

कुछ लोगों के लिए तो झूठ बोलना इतना आसान है कि जहां सच से काम चल जाए. वहां भी उन के मुंह से झूठ ही निकलता है. वैसे झूठ बोलने की अनिवार्यता को पहली बार करीब 2 दशक पहले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोविज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफैसर बेला डे पोलो ने दस्तावेज किया था.

पोलो और उनके साथियों ने 147 वयस्कों से कहा था कि वे लिखें हर हफ्ते उन्होंने कितनी बार झूठ बोला. सामने आया कि हर व्यक्ति ने दिन में औसतन 1 या 2 बार झूठ बोला. इन में से ज्यादातर झूठ किसी को नुकसान पहुंचाने या धोखा देने वाले नहीं थे. बल्कि, उद्देश्य अपनी कमियां छिपाना या दूसरों की भावनाओं को बचाना था. हालांकि, बाद में की गई एक स्टडी में पोलो ने पाया कि ज्यादातर ने किसी मौके पर एक या एक से ज्यादा बार बड़े झूठ भी बोले हैं. जैसे शादी के बाहर किसी रिश्ते को छिपाना और उस के बारे में झूठ बोलना.

आदत या कुछ और

भले ही झूठ बोलने पर कौवा काट ले, पर हम झूठ बोलने से परहेज नहीं कर सकते, क्योंकि कहीं न कहीं यह हम इंसान के डीएनए का हिस्सा है या कहें आधुनिक जीवन के करीब हर पहलू में झूठ बोलना एक सामान्य रिवाज बन गया है. इस पर नैशनल जियोग्राफिक की जून, 2017 के अंक में झूठ के पीछे के विज्ञान को समझते एक लेख पर नजर डालिए, तो इस के मुताबिक, इंसानों में झूठ बोलने की प्रतिभा नई नहीं है.

शोध बताता है कि भाषा की उत्पत्ति के कुछ वक्त बाद ही झूठ बोलना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन गया.

आखिर क्यों बोलते हैं लोग झूठ

हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोयबल्स की एक बात बड़ी मशहूर है. वह यह कि किसी झूठ को इतनी बार कहो कि वह सच बन जाए और सब उस पर यकीन करने लगें.

आप ने भी अपने आसपास ऐसे लोगों को देखा होगा, जो बहुत ही सफाई से झूठ बोल लेते हैं. वे अपना झूठ इतने यकीन से पेश करते हैं कि वह सच लगने लगता है. हमें लगता है इंसान इतने भरोसे से कह रहा है, तो बात सच ही होगी.

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"कोरोनाकाल में रोजाना करीब 10 हजार लोगों तक खाना और राशन पहुंचाया” आंचल शर्मा - संस्थापक, मील्स औफ हैप्पीनेस

एक हफ्ता पहले ही मुझे कैंसर डायग्नोज हुआ था और मैं अपने दोस्तों से मिल कर वापस जा रही थी. तभी सड़क पर मेरी गाड़ी रुकी तो कुछ बच्चे आ गए. वे भूखे थे और खाना मांग रहे थे. मैं उन्हें ले कर पास के फूड स्टाल गई और उन्हें भरपेट चाऊमीन खिलाए. वे बहुत खुश हुए. उन्हें खुश देख कर मुझे अलग ही खुशी मिली. उस समय मैं यह तक भूल गई कि मुझे कैंसर डायग्नोज हुआ है और उस दिन मुझे मेरे जीने की नई वजह मिली. मैं ने सोचा कि मुझे नहीं पता मेरे पास कितना समय बचा है. ज्यादा कुछ तो मैं नहीं कर सकती, लेकिन इतना तो कर ही सकती हूं कि कुछ गरीबों को पेट भर खाना खिला सकूँ. उसी दिन 'मील्स औफ हैप्पीनेस चैरिटेबल ट्रस्ट' की शुरुआत हुई," यह कहना है दिल्ली के छतरपुर में रहने वाली 36 साल की आंचल शर्मा का, जिन्होंने अपनी तकलीफ भुला कर लोगों को खाना बांटा. कोरोनाकाल में भी इन का काम बदस्तूर चलता रहा.

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