जमीन में हिस्सेदारी विधवाओं की जान पर भारी
Sarita|September First 2021
जो समाज महिलाओं की ऊंची आवाज बरदाश्त नहीं कर सकता, क्या वह किसी विधवा महिला की जमीन में हिस्सेदारी बरदाश्त कर सकता है...
शैलेंद्र सिंह

साल 2005 में केंद्र की डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार ने पति की मौत के बाद उस की विधवा पत्नी का नाम आवश्यक रूप से दर्ज करने का आदेश दिया. इस के बाद से खेती की जमीन में भी पति के न रहने के बाद पत्नी और बेटी का नाम दर्ज किया जाने लगा. पत्नी और बेटी को भी बराबर का हिस्सा मिलने लगा. जायदाद के कागजों में नाम दर्ज होने का सब से बड़ा लाभ यह हुआ कि अब बिना विधवा की सहमति के जमीन को बेचा नहीं जा सकता. ऐसे में कई बार विधवा औरतों को हिंसा का शिकार होना पड़ता है. लखनऊ जिले की मोहनलालगंज तहसील के निगोहां थाने में घटी ऐसी घटनाएं इस का उदाहरण हैं.

कानून के द्वारा भले ही महिलाओं को संपत्ति अधिकार मिल चुका हो पर घरपरिवार के लोग किसी भी तरह से संपत्ति में महिलाओं को अधिकार नहीं देना चाहते. ऐसे में अगर महिला बूढ़ी है और उस के पति की मौत हो चुकी है तो बेटा तक उसे जमीन नहीं देना चाहता. जिन परिवारों में बेटा नशे जैसी बुरी आदत का शिकार हो वहां तो ऐसे लोगों की हत्या तक कर दी जाती है. लखनऊ जिले के निगोहां थाना क्षेत्र के कलासर खेड़ा गांव में रहने वाले संजय ने अपनी 48 साल की मां लीलावती की हत्या कर दी.

कलासर खेड़ा में रहने वाले श्रीकेशन की 4 साल पहले मौत हो चुकी थी. श्रीकेशन के पास खेती की 3 बीघा जमीन थी. श्रीकेशन के परिवार में बड़ा बेटा संजय और छोटा बेटा संगम थे. उस की एक बेटी राजरानी भी थी. दोनों बेटों और बेटी की शादी हो चुकी थी. छोटा बेटा संगम लखनऊ में रह कर मजदूरी करता था. बड़ा संजय गांव में रहता था, नशे का आदी था. श्रीकेशन की मौत के बाद पत्नी लीलावती अपने दोनों ही बेटों से अलग गांव में ही कोठरी में रहती थी. श्रीकेशन की खेती वाली जमीन उस के दोनों बेटों, बेटी और पत्नी के नाम हो जानी थी. लंबे समय तक यह काम नहीं हो पाया.

दो माह पहले हुई थी विरासत

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