जंजाल है बुजुर्गों की देखभाल
Sarita|August Second 2021
वृद्धाश्रमों को लोगों ने अनैतिकता का पैमाना बना दिया है कि वहां रह रहे बुजुर्गों के बेटा, बेटी या बहू गलत रहे होंगे, उन पर अन्याय करते रहे होंगे. लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही. इस के उलट समझना भी जरूरी है कि आखिर क्यों ऐसे मामले अधिक बढ़ रहे हैं और इस के पीछे की वजह क्या है?
भारत भूषण श्रीवास्तव

बात 1 जुलाई की है. रात को लगभग 11 बजे एक महंगी कार विदिशा के हरि वृद्धाश्रम में आ कर रुकी. उस में से एक सुंदर लेकिन हैरान परेशान महिला एक बुजुर्ग को ले कर उतरी. महिला का नाम नेहा और साथ उतरे उस के पिता जिन का नाम महेश तिवारी है. भोपाल निवासी 87 वर्षीय महेश तिवारी समाज कल्याण विभाग से रिटायर्ड प्रथम श्रेणी अधिकारी हैं. उन की पैंशन ही करीब 40 हजार रुपए महीना बनती है. भोपाल के पौश शाहपुरा इलाके में उन का अपना बड़ा सा मकान है.

नेहा ने वृद्धाश्रम के संचालक दंपती वेदप्रकाश शर्मा और इंदिरा शर्मा से गिड़गिड़ाते अंदाज में आग्रह किया कि उस का बेटा बीमार है जिस की देखभाल के लिए वह कुछ दिनों के लिए पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ना चाहती है. अपने हालात सामान्य होते ही वह पिता को ले जाएगी. वेदप्रकाश शर्मा द्वारा आवश्यक पूछताछ करने पर उस ने बताया कि उस के पिता एक सामान्य वृद्ध हैं और उन्हें कोई क्रिटिकल बीमारी नहीं है. आश्रम में जगह खाली थी और इंदिरा व वेद को नेहा से हमदर्दी भी हो आई थी, इसलिए उन्होंने तुरंत औपचारिकताएं पूरी करते महेश तिवारी को भरती कर लिया.

टीवी सीरियल सी कहानी

लेकिन महेश तिवारी सामान्य वृद्ध नहीं निकले जैसा कि नेहा ने बताया था. वे एक हिंसक वृद्ध निकले, जिस ने देखते ही देखते इस वृद्धाश्रम की शांत जिंदगी में खासा तहलका और उपद्रव मचा दिया. शुरू के दोतीन दिन सामान्य रहने के बाद उन्होंने आश्रम के दूसरे वृद्धों को भद्दी गलियां देनी शुरू कर दी. हद तो तब हो गई जब उन्होंने दूसरे वृद्धों सहित स्टाफ के सदस्यों की पिटाई भी करनी शुरू कर दी. वेदप्रकाश महेश तिवारी का यह रौद्र रूप देख घबरा उठे जो स्वाभाविक बात भी थी क्योंकि वे बिलकुल विक्षिप्तों जैसी हरकतें कर रहे थे.

आश्रम के बुजुर्गों ने इस पर एतराज जताया और स्टाफ के 2 कर्मचारियों ने तो आश्रम आना ही बंद कर दिया. वेदप्रकाश ने नेहा को फोन किया और उन्हें उन के पिता की करतूतें बताईं. लेकिन नेहा उन्हें लेने नहीं आई तो उन का माथा ठनका क्योंकि हरि वृद्धाश्रम को उन्होंने 15 साल की कड़ी मेहनत व लगन से नाम और मुकाम दिया है. ऐसा पहली बार हो रहा था कि आश्रम में रह रहे बुजुर्ग इस नए मेहमान के बरताव को ले कर दहशत में आ गए थे लेकिन कहीं और वे जा नहीं सकते थे क्योंकि अब यही उन का यह आखिरी सहारा था.

पिता द्वारा दूसरे बूढ़ों की कुटाई करते और गालियां बकते वीडियो भी वेदप्रकाश ने नेहा को भेजे लेकिन उस ने विदिशा आ कर पिता को वापस ले जाने से साफ इनकार कर दिया. जब उसे यह बताते दबाव बनाया गया कि ऐसे क्रिटिकल बूढ़ों को सामान्य वृद्धाश्रम में नहीं रखा जा सकता, उन के लिए विशेष प्रबंध करना होगा और यह सरासर धोखाधड़ी है, तो नेहा इस बात पर राजी हो गई कि ठीक है, आप ही पापा को भोपाल छोड़ जाइए. इस बाबत उस ने अपने घर का पता भी दे दिया.

वेदप्रकाश ने सोचा कि चलो पिंड छूटा और 16 जुलाई को उन्होंने कार द्वारा आश्रम की टीम के साथ महेश तिवारी को भोपाल रवाना कर दिया. भोपाल में दिए गए पते पर यह टीम पहुंची तो घर पर ताला झूल रहा था. नेहा भी आधार कार्ड पर दिए अपने पते पर नहीं मिली. अड़ोसपड़ोस में पूछताछ करने पर पता चला कि यह मकान है तो इन्हीं तिवारीजी के नाम लेकिन मुद्दत से खाली पड़ा है. उन की बेटी कहीं और रहती है. और जानकारी ली तो यह बात भी सामने आई कि इस के पहले महेश तिवारी अपने बेटे के साथ रहते थे जो अब मुंबई शिफ्ट हो गया है. नेहा ने भाई से कानूनी लड़ाई लड़ कर पिता की सेवा और संपत्ति का हक हासिल किया था. वह अविवाहित है और उस ने बच्चा गोद लिया हुआ है.

आश्रम टीम अब सकते में थी क्योंकि इस महाभारत के श्रवण से उन का मकसद हल नहीं हो रहा था. थकहार कर उन्होंने शाहपुरा थाने की शरण ली और बताया कि किस तरह धोखा दे कर दिमागी तौर पर बीमार बुजुर्ग को उन के पल्ले बांध दिया गया है. लेकिन पुलिस वालों ने हाथ खड़े कर दिए कि हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते. इस टीम ने पुलिस वालों को यह भी बताया कि 'मातापिता भरण पोषण कानून 2005' के तहत वृद्ध मातापिता की देखभाल करना संतान की जिम्मेदारी है जो उन की पैंशन भी ले रही है और जायदाद का भी इस्तेमाल कर रही है. पर तमाम ज्ञान और दलीलें देने के बाद भी बात नहीं बनी तो यह टीम महेश तिवारी को वापस विदिशा ले गई.

तिवारी जी को वापस आया देख आश्रम के बूढ़े फिर दहशत से भर उठे लेकिन असल आफत वेदप्रकाश और इंदिरा की थी जो इस हिंसक वृद्ध को न तो निगल सकते थे और न उगल सकते थे की तर्ज पर न तो रखने का जोखिम उठा सकते थे और न ही यों भगा सकते थे. यानी एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई थी. इन दोनों को डर इस बात का था कि कहीं इस बुजुर्ग के हाथों कुछ उलटा सुलटा हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. भोपाल से उन्हें यह भी पता चला था कि नेहा का अपना अलग रसूख है और उस के हाथ बहुत लंबे हैं.

लेकिन कुछ तो करना ही था, इसलिए वेदप्रकाश ने भोपाल में पुलिस के आला अफसरों को अपनी परेशानी बताई तो आखिरकार 21 जुलाई को महेश तिवारी को नेहा के एक दोस्त के जरिए सुपुर्द कर भोपाल भेज दिया गया.

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