आईएएस अफसरों का दर्द
Sarita|July First 2021
भ्रष्टाचार को सहज ढंग से लेने की मानसिकता दरअसल एक साजिश है जिस का विरोध एक आईएएस अधिकारी ने किया तो उसे तरहतरह से प्रताड़ित किया गया ताकि भविष्य में कोई दूसरा आपत्ति न जताए. पेश है खोखली होती प्रशासनिक व्यवस्था का सच बयां करती यह खास रिपोर्ट.
भारत भूषण

नए शहर और नए घर में आ कर अभी सलीके से सामान भी नहीं जमा पाए थे कि एक बार फिर तबादले का फरमान आ गया. हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के युवा आईएएस अधिकारी लोकेश जांगिड़ की जो बीती 16 जून तक बड़वानी जिले के अपर कलैक्टर हुआ करते थे. इस शाम मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव दीप्ति गौड़ मुखर्जी ने लोकेश को फोन पर राज्य शिक्षा केंद्र में तबादले की सूचना दी तो उन्हें कोई खास हैरानी नहीं हुई लेकिन दिल और दिमाग जरूर खटास व भड़ास से भर गए.

पहली नियुक्ति के बाद 2014 के बैच के अधिकारी लोकेश का 54 महीनों में यह 9वां तबादला था जिस का अंदेशा उन्हें कुछ दिनों पहले से ही एक खास वजह के चलते था. सो, उन्होंने सप्ताहभर पहले ही अपने गृहराज्य महाराष्ट्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए राज्य सरकार को आवेदन दिया था. दीप्ति गौड़ से उन्होंने तबादले की वजह पूछी तो जवाब मिला, 'भोपाल आ जाओ, फिर बात करते हैं.' लोकेश ने इस बातचीत को रिकौर्ड कर लिया और अपने कुछ सीनियर्स को फौरवर्ड कर दिया जो कथित तौर पर लीक भी हुई. रात होतेहोते राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासा हल्ला मच गया क्योंकि एक व्हाट्सऐप चैट भी वायरल हो चुकी थी.

आईएएस अधिकारियों के एक सोशल मीडिया ग्रुप की इस वायरल चैट में लोकेश ने लिखा था, "मेरे रहते बड़वानी कलैक्टर शिवराज वर्मा पैसा नहीं खा पा रहे थे, इसलिए मुझे हटाया गया है. उन्होंने शिवराज सिंह चौहान के कान भर दिए. ये दोनों एक ही समाज से आते हैंकिरार समाजजिस की सैक्रेटरी कलैक्टर की पत्नी हैं और सीएम शिवराज सिंह की पत्नी किरार समाज की प्रेसिडेंट हैं."

आगे लोकेश ने लिखा, "मैं रिटायरमैंट के बाद एक किताब लिखूगा और उस में सभी तथ्यों को लिखूगा क्योंकि अभी मेरे हाथ घटिया सेवा नियमों से बंधे हुए हैं. मैं किसी से नहीं डरता हूं, इसलिए सब खुलेआम बोल रहा हूं. कोई मुझे समझाने की कोशिश न करे. मध्य प्रदेश में कार्यकाल की स्थिरता और सिविल सर्विस बोर्ड नामक संस्था एक चुटकुला है. बिहार में ऐसे अधिकारियों को कलैक्टर नहीं बनाया जाता जो पैसे बनाने में लगे रहते हैं. मध्य प्रदेश में इस मामले में जितना कहा जाए, कम है. दिलचस्प बात यह है कि जो लोग हर तरह के माफिया से पैसे निकालते हैं उन का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में ट्रांसफर होता है और त्रुटिहीन ईमानदार लोग स्थानांतरण पर सचिवालय में फेंक दिए जाते हैं.

ये वे बातें हैं जिन्हें हर कोई जानतासमझता है लेकिन लोकेश जांगिड़ जैसे जनूनी युवा अधिकारी जब नजदीक से देख कर इन का खुलासा करते हैं तो उन का स्वागत कम, विरोध ज्यादा होता है. विरोध भी ज्यादा उल्लेखनीय बात नहीं, अफसोस तब होता है जब सारे बेईमान लठ ले कर उन पर पिल पड़ते हैं. आगे वही हुआ जो आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है कि लोकेश को कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया. सत्तापक्ष ने उन की इस हरकत को अनुशासनहीनता बताया तो विपक्ष ने उन की वकालत की.

यह थी हकीकत

लोकेश जांगिड़ का एक बड़ा गुनाह यह था कि उन्होंने बड़वानी कलैक्टर शिवराज वर्मा द्वारा कोरोना की दूसरी लहर के दौरान औक्सीजन कंसंट्रेटर की खरीद में हुए भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया था. पूरे देश में जब प्रशासनिक अधिकारियों सहित प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों के नर्स और वार्डबौय तक लोगों की जिंदा रहने की मजबूरी को भुना रहे थे तब बड़वानी भी इस से अछूता नहीं रहा था. 39 हजार रुपए मूल्य के कंसंट्रेटर 60 हजार रुपए प्रति नग के हिसाब से खरीदे गए थे जिस की सीधी जिम्मेदारी कलैक्टर की होती है. दूसरे कई उपकरणों की खरीद में भी घोटाले हुए थे.

लोकेश बड़वानी के कोरोना इंचार्ज भी थे और इस घोटाले का हिस्सा बनने के बजाय वे उसे उजागर कर रहे थे. सो, यह तो होना ही था. जनता के पैसे की बंदरबांट में शामिल न होना उन की बड़ी गलती थी जिसे ज्यादा देर तक वे बरदाश्त नहीं कर पाए और सबकुछ, जो सच का आधा हिस्सा ही है, उजागर कर दिया. रातोंरात वे ख़ियों में आ गए और उन की तुलना हरियाणा के आईएएस अशोक खेमका से की जाने लगी.

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