लाइलाज नक्सलवाद बेबस सरकार
Sarita|April Second 2021
सत्ता अगर वाकई बंदूक की नली से मिलती, जैसा कि नक्सली मानते हैं, तो दुनियाभर में राज आतंकियों का होता. लोकतांत्रिक व्यवस्था में खामियां और कमजोरियां हैं और अब तो शोषण व तानाशाही भी लोकतंत्र की ओट में होने लगे हैं. लेकिन हिंसक और सशस्त्र विरोध यानी नक्सलवाद इस का हल नहीं है, न ही सरकार का हिंसक जवाब इस का हल है.
भारत भूषण श्रीवास्तव

नक्सलवाद की उत्पत्ति स्थान पश्चिम बंगाल राज्य के चुनाव प्रचार में इस बार नदारद वामपंथियों की जगह रामपंथी बेखौफ हो कर जयजय श्रीराम का नारा लगाते नजर आए. इस राज्य में पहले कभी किसी चुनाव में धर्म, हिंदुत्व या तुष्टिकरण का मुद्दा बहुत बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा था तो इस की अपनी वजहें भी थीं. इस में भी कोई शक नहीं रह गया है कि यह विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल से वामपंथ को औपचारिक विदाई देगा जिस का राजनीतिक तौर पर खत्म होना एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक घटना भी होगी.

वामपंथ ने कभी पश्चिम बंगाल को जमींदारों के शोषण से मुक्त कराए बिना किसी भेदभाव के किसानों और मजदूरों सहित आम लोगों की बदहाली भी दूर की थी. नई पीढ़ी वामपंथ के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती, लेकिन नक्सलियों के बारे में जरूर उसे समझ आ रहा है कि चंद सिरफिरे माओवादी लोग मुद्दत से हथियारों के दम पर सत्ता हथिया लेने को आएदिन हिंसा करते रहते हैं.

एक सही बात गलत तरीके से कही जाए तो उस के माने खत्म होने लगते हैं. यही नक्सलियों के साथ हो रहा है जिन्हें माओवादी भी कहा जाता है. इन का मकसद जो भी हो हिंसा के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराना जरूर एतराज व चिंता की बात है जिस से फायदा किसी को नहीं होता और न ही इस से उन का मकसद पूरा होने वाला है.

एक बार फिर इन नक्सलियों ने हिंसा के जरिए अपनी बात चिरपरिचित अंदाज में कही जिस से लगा कि नक्सली कोई भटके हुए युवा या भ्रमित बुद्धिजीवी नहीं हैं जो किसी धौंसधपट से डर जाएंगे या फिर बातों के बताशे फोड़ने वालों के झांसे में आ जाएंगे.

बात वाकई निराशा व हताशाजनक है कि नक्सली आंदोलन जिस वनवे से हो कर गुजरा है उस पर से उन की वापसी की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती. पहले एक नजर ताजे नक्सली हमले पर डाली जानी जरूरी है जो नक्सलियों की कार्यशैली भी दिखाती है.

बीजापुर-सुकमा बौर्डर, 3 अप्रैल, 2021

नक्सली बहुत चतुर और शातिर होते हैं, यह बात केंद्र और राज्य सरकारों सहित छत्तीसगढ़ में तैनात सीआरपीएफ के जवानों व स्थानीय पुलिस वालों से भी छिपी नहीं है. नक्सली जो कहते हैं वह आमतौर पर करते हैं और जो नहीं कहते वह जरूर करते हैं.

ऐसा ही कुछ वारदात के दिन 3 अप्रैल को बस्तर अंचल के बीजापुर और सुकमा जिलों की सीमाओं पर हुआ. उस दिन सुरक्षा बलों को नक्सलियों के छिपे होने की खबर मिली थी. नक्सलियों की तलाश के लिए अलगअलग कैंपों से कोई 3 हजार जवान इकट्ठा हो कर टेकलगुडा की तरफ नक्सलियों की तलाश में निकल पड़े.

नक्सलियों की लोकेशन पता करने के लिए सुरक्षा बलों ने ड्रोन का सहारा लिया था जिस को भांपते नक्सलियों ने अपनी दिशा बदलते दूसरा रास्ता पकड़ लिया.

यह पूरा इलाका नक्सलियों का गढ़ है जहां आमतौर पर बाहरी लोग नहीं आते. बीजापुर और सुकमा के चारों तरफ घने दुर्गम जंगल हैं जिन के चप्पेचप्पे से नक्सली बेहतर तरीके से वाकिफ हैं. दोनों पक्ष एकदूसरे की टोह लेते अपनी रणनीति बनाते, बदलते रहे. दोनों को एकदूसरे की ताकत का सटीक अंदाजा नहीं था.

दोपहर के 11 बजे नक्सलियों ने सुकमा-बीजापुर के बौर्डर पर स्थित गांव जोनागुड़ा के पास जवानों पर हमला कर दिया. यह जगह सुरक्षाबलों के बेस कैंप तरेम से महज 15 किलोमीटर दूर है.

यह लड़ाई पूरी तरह रामायण और महाभारत सीरियलों की तरह मायावी सी थी जिस में नक्सली ऊपर पहाड़ियों पर थे और जवान नीचे मैदान में थे. नक्सलियों की संख्या 250 के लगभग थी, तो जवानों की संख्या तकरीबन 2,000 थी. दोनों पक्ष आधुनिक हथियारों से लैस थे.

शुरुआत नक्सलियों ने गोलियां दागने से की. जवान इस अप्रत्याशित हमले से सकपका गए और छिपने की जगह व ओट ढूंढ़ने लगे जिस से गोलीबारी का जवाब दिया जा सके. उन के लिए यह एक अहम औपरेशन था जो अगर कामयाब हो जाता तो नक्सलियों की रीढ़ उन के ही गढ़ में टूट जाती और एक बड़ी कामयाबी उन के हिस्से में आती.

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि नक्सलियों ने उन्हें चौतरफा घेर रखा था जो 3 तरफ से फायरिंग कर रहे थे. रौकेट लौंचर का इस्तेमाल भी उन्होंने किया. हालांकि सुरक्षा बलों के जवान 2 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए थे लेकिन जल्द ही वे इस में फंसे साबित हो गए. बिखरे होने के चलते भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ा. इस के बाद भी वे पूरी हिम्मत व बहादुरी से लड़े और 5 घंटों तक नक्सलियों से जूझते रहे.

नक्सलियों की तरफ से इस मुठभेड़ का संचालन और नेतृत्व कुख्यात खूखार नक्सली कमांडर मांडवी हिडमा कर रहा था जो माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी यानी पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का लीडर भी है. कई खूबियों वाला हिडमा एक गैरमामूली शख्सियत का मालिक है. (देखें बौक्स).

शाम के धुंधलके के बाद जब अघोषित युद्ध विराम हुआ तो दोनों पक्ष अपनेअपने लड़ाकों की लाशें बीनने लगे. सुरक्षाबलों के 24 जवानों को बीजापुर अस्पताल ले जाया गया और 7 को इलाज के लिए रायपुर रवाना किया गया. नक्सली भी अपने मृत व घायल साथियों को ट्रैक्टरों में लाद कर चलते बने लेकिन जातेजाते वे एक जवान राकेश्वर सिंह मन्हास को बंधक बना कर साथ ले गए जिसे उन्होंने 5 दिन बाद सहीसलामत रिहा कर दिया. इस भीषण मुठभेड़ में 24 जवान मारे गए.

नक्सलियों ने जातेजाते, आदत के मुताबिक, मृत जवानों के हथियार इकट्ठा किए और उन के जूते वगैरह भी उतार कर ले गए. बाद में सरकार की तरफ से 12 नक्सलियों के ढेर होने का दावा किया गया जिन में वरदी पहने एक महिला भी थी.

एक दिलचस्प बात मुठभेड़ के बाद यह सामने आई कि नक्सली अपनी एक खास और अनूठी किस्म की रणनीति, जिसे रिवाज भी कहा जा सकता है, के तहत हर साल 20 फरवरी से 25 अप्रैल तक सुरक्षा बलों पर हमला जरूर करते हैं.

3 अप्रैल के पहले उन्होंने 23 मार्च को भी छत्तीसगढ़ के ही नारायणपुर में सुरक्षा बलों से भरी एक बस को बारूदी सुरंग में विस्फोट कर उड़ा दिया था जिस में 5 जवान मारे गए थे और 15 के लगभग घायल हो गए थे.

मारे गए जवानों की लाशें नक्सलियों ने पहाड़ी पर ढेर बना कर रखी थीं और वे वहीं मौजूद थे पहाड़ी पर. जगहजगह गोलियां, जवानों की लाशें और खून के धब्बे थे. वहां टहल रहे नक्सलियों की मंशा निश्चितरूप से यह जताने की थी कि यहां किसी सरकार का नहीं, बल्कि उन का एकछत्र राज है. यह बात बंधक बनाए गए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह की रिहाई के दिन 9 अप्रैल को भी साबित हुई थी जिसे उन्होंने समारोहपूर्वक रिहा किया था.

अपनी ताकत और पहुंच का एहसास कराते नक्सलियों ने कुछ शर्ते भी रखीं थीं, मसलन रिहाई मध्यस्थों और मीडियाकर्मियों की मौजूदगी में की जाएगी. ये मध्यस्थ भी बस्तर और छत्तीसगढ़ की नामीगिरामी हस्तियां थीं जिन में पद्मश्री से सम्मानित धर्मपाल सैनी और गोंडवाना समाज के मुखिया तेलम बोरेया के नाम उल्लेखनीय हैं. बीजापुर के 2 पत्रकार मुकेश चंद्राकर और गणेश मिश्रा भी हजारों लोगों के साथ मौजूद थे.

नक्सलियों ने सरकार के साथ क्या डील की थी, इस का पूरा खुलासा शायद ही कभी हो लेकिन घोषिततौर पर उन्होंने कुंजाम सुक्का नाम के आदिवासी की रिहाई की मांग की थी जो पूरी हुई. इस आदिवासी को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ के दौरान अपने कब्जे में ले लिया था. यह मुठभेड़ 2 देशों के युद्ध सरीखी थी जिस में सरहद पर सैनिक जीजान से लड़ रहे होते हैं, इसी तरह फिल्मी तर्ज पर राकेश्वर सिंह और कुंजाम सुक्का की अदलाबदली हुई. यानी, इस हाथ दे और उस हाथ ले.

दिलचस्प इतिहास

कुंजाम सुक्का की रिहाई की मांग से नक्सलियों ने एक तीर से कई निशाने साधे जिन में पहला यह जताना था कि अर्धसैनिक बल आदिवासियों के हितैषी नहीं हैं जो अकसर बेगुनाह आदिवासियों को प्रताड़ित और आदिवासी औरतों का यौन शोषण किया करते हैं. दूसरे, इस से वे यह साबित करने में भी कामयाब रहे कि नक्सली ही आदिवासियों के असल हमदर्द हैं. यह बात सिरे से खारिज नहीं की जा सकती क्योंकि नक्सली इलाकों में जहां अर्धसैनिक बल तैनात हैं वहां ऐसा आएदिन होता रहता है.

दरअसल, इस गोरखधंधे को समझने के लिए नक्सली इतिहास को समझना जरूरी है जिस की नींव 60 के दशक में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के गांव नक्सलबाड़ी में रखी गई थी. इसीलिए माओवादियों को नक्सलवादी कहा जाने लगा. आजादी के बाद इस राज्य में कांग्रेस सत्ता में आई थी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विपक्षी दल था.

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