धर्म बेचता ओटीटी
Sarita|April First 2021
हिंदी के ओटीटी प्लेटफौर्स पर अब धर्म और सैक्स का कारोबार फलफूल रहा है. युवाओं का ब्रेनवाश करने के लिए धर्म को सैक्स की चाशनी में डुबो कर बेचा जा रहा है. जीवन व देश के मुद्दों की बातें गायब हैं. वही हो रहा है जो सरकार व धर्म के ठेकेदार चाहते हैं. कभीकभार थोड़ा सच कोई परोस भी देता है तो धर्म के धंधेबाज व अंधभक्त इतना हल्ला मचाते हैं कि देश, धर्म तथा संस्कृति सब खतरे में पड़ते नजर आने लगते हैं. पेश है इस गोरखधंधे पर खास रिपोर्ट.
शांतिस्वरूप त्रिपाठी और भारत भूषण श्रीवास्तव

धर्म व सैक्स हर इंसान की कमजोरी है. सैक्स के प्रति युवाओं में तो हमेशा जिज्ञासा रहती है. इसी कमजोरी को भुनाते सिनेमा व दृश्य श्राव्य यानी औडियो-विजुअल माध्यम से जुड़े धंधेबाज लगातार अपनी जेबें व झोलियां भरने में लगे रहते हैं. लेकिन फिल्मकारों के आका उन्हें धर्म को बेचने को भी मजबूर करते हैं कि बिकना असल में धर्म है, सैक्स नहीं.

सिनेमा के इतिहास पर नजर दौड़ाते हैं तो यह बात सामने आती है कि फिल्मकारों ने भी हमेशा हिंदू धर्म को और वह भी कट्टरपंथी और पौराणिकवादी को ही ज्यादा परोसा या बेचा है. इस में छोटे से बड़े स्टार कलाकारों, फिल्मकारों, निर्माताओं, लेखकों, गायकों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 'राजा हरिश्चंद्र', 'रामराज्य', अलख निरंजन', 'हरिदर्शन', 'बजरंग बली', 'हरिश्चंद्र तारामती', 'पीके', 'ओ माई गौड', 'जय संतोषी मां', 'मां संतोषी मां', 'शिरडी के साईं बाबा', 'लक्ष्मी', 'कृष्णा और कंस', 'पांडवाज द वौरियर्स', 'कुरुक्षेत्र', 'लवकुश', 'सती अनुसूया', 'सत्य साईं बाबा', 'यशोदा कृष्ण', 'वीर भीमसेन', 'पूजा के फूल', 'दादी मां', 'आदि पुरुष' सहित हजारों हिंदू धर्म को बेचने वाली फिल्में बन चुकी हैं जिन में निर्माताओं ने धर्म को खुलेआम बेचा. 70 व 80 के दशकों में तो कुछ लेखकों ने अपनी फिल्मों में खुदा को भी बेचा.

जब वीडियो कैसेट संस्कृति की शुरुआत हुई थी, तब लगा था कि कुछ रचनात्मक व स्वस्थ मनोरंजन मिलेगा.मगर बाद में वीडियो कैसेट निर्माता भी धर्म व सैक्स को ही बेचने लगे. उस के बाद दूरदर्शन पर जब टीवी सीरियलों की शुरुआत हुई तो 'हम लोग', 'बुनियाद' जैसे पारिवारिक धारावाहिक प्रसारित हुए लेकिन जल्द ही दूरदर्शन ने भी 'रामायण', 'महाभारत', 'श्रीकृष्ण सहित कई धार्मिक धारावाहिकों का प्रसारण करते हुए धर्म को बेचना जारी कर दिया. पारिवारिक धारावाहिकों में भी जम कर अंधविश्वासों में विश्वास दिलाया गया है और विज्ञान व तर्क को हलका दिखाया गया बारबार, अनेक बार.

सैटेलाइट चैनलों ने अपनी शुरुआत के साथ ही 'किचन पौलिटिक्स' परोसते हुए नारी को नागिन के ही रूप में पेश किया. यह भी धार्मिक था क्योंकि धर्म ही औरतों को पापयोनि की जन्मी मानता है. फिर धीरेधीरे सैटेलाइट चैनल भी यह हिंदू पारंपरिक धर्म बेचने लगे. आज भी टीवी पर धार्मिक धारावाहिक ही सब से ज्यादा परोसे यानी बेचे जा रहे हैं और वे बिक भी रहे हैं यानी दर्शकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें देख रहा है. ऐसे धारावाहिकों का प्रचारप्रसार हर मंदिर व प्रवचन के माध्यम से भी होता है.

धर्म के इन कारोबारियों ने प्रसार माध्यमों के जरिए बच्चों को भी नहीं बख्शा है. गणेश और कृष्ण को उन की समझ के हिसाब से वीडियो तैयार कर उन तक पहुंचाए जा रहे हैं. दरअसल, इस पूरे कारोबार में नया कुछ है तो इतना कि धर्म और सैक्स बेचने का प्लेटफौर्म सिर्फ पाठ और प्रवचन नहीं बल्कि वक्त के हिसाब से टीवी व मोबाइल स्क्रीन में बदल गया है. यह एक और प्रसार माध्यम आ गया है लेकिन परोसा तो वही पुराना जा रहा है जिस से लोगों की कमजोरी को नकदी में भुनाया जा सके और उन्हें धर्म का गुलाम बनाया जा सके.

हिंदी फिल्मों का हमेशा से ही यह ट्रेंड रहा है कि कहानी कुछ भी हो और उस की मांग हो न हो, उस में कैसे भी भगवान जरूर लूंसा जाए. 75 फीसदी फिल्मों के टाइटल ही किसी श्लोक और देवीदेवता की स्तुति से शुरू होते हैं. पूजा करती बूढ़ी दादी या मां अपवादस्वरूप ही किसी फिल्म में नहीं दिखाई देती. शायद ही ढूंढ़े से कोई फिल्म मिलेगी जिस में मंदिर का दृश्य न हो.

यह सब बेवजह नहीं होता. इस का मकसद दर्शक की धार्मिक भावनाओं को भुनाना भी होता है और उसे धर्म का ग्राहक बनाए रखना भी. एक सटीक मिसाल अमिताभ बच्चन अभिनीत हिट फिल्म 'दीवार' है जिस में नायक को पूरी फिल्म में नास्तिक दिखाया गया है लेकिन अंतिम दृश्य में उसे ईश्वर की शरण में जाते उस की महत्ता स्वीकार करनी पड़ती बताया गया है. आज का ओटीटी प्लेटफौर्म इस मानसिकता का अपवाद नहीं है क्योंकि उस का मकसद भी वही है जो फिल्म के निर्मातानिर्देशक का रहता हैधर्म के लिए पैसे बनाना. क्योंकि उन्हें भी विश्वास है कि उन का बेड़ा पार तो कोई देवीदेवता ही करेगा.

तकनीक की प्रगति के चलते 2008 में रिलायंस इंटरटेनमैंट ने पहला ओटीटी प्लेटफौर्म 'बिगफ्लैक्स' लौंच किया जिस की तरफ लोगों का ध्यान न के बराबर ही गया. उस के बाद 2010 में डिगिविवि ने 'नैक्स्ट जीटीवी' लौंच किया था. जब 'डिट्टो टीवी' और 'सोनी लाइव' जैसे ओटीटी प्लेटफोर्स की शुरुआत हुई तो लोगों का ध्यान ओटीटी प्लेटफौर्स की तरफ गया. 2015 में 'नैटफ्लिक्स' का आगमन हुआ और फिर धीरेधीरे ओटीटी प्लेटफोर्स की बाढ़ आ गई. सैंसर के भय से मुक्त ओटीटी प्लेटफौर्स पर बोल्ड व सत्यपरक कंटैंट परोसने के नाम पर देखते ही देखते हिंसा व सैक्स भी बेचे जाने लगे. निर्माता धर्म की घुट्टी भी पिला देते और सैक्स की डोज भी दे देते हैं.

2016 में केंद्र सरकार द्वारा सौ फीसदी एफडीआई का कानून बना दिए जाने के बाद विदेशी पैसे के बल पर ओटीटी प्लेटफौर्स परवान चढ़ने लगे. सभी ओटीटी प्लेटफौर्स मान बैठे कि अब उन्हें हर तरह की आजादी मिल गई है जिस में धर्म को भी बेचने की आजादी निहित है. धीरेधीरे बड़ेबड़े फिल्मकार व कलाकार वैब सीरीज करने लगे. 2018 में अनुराग कश्यप व विक्रमादित्य मोटवाणे ने विक्रम चंद्रा के 2006 में छपे उपन्यास 'सैक्रेड गेम्स' पर अपराध, रहस्य व रोमांच प्रधान वैब सीरीज 'सैक्रेड गेम्स' बनाई जिस का प्रसारण 'नैटफ्लिक्स' पर 6 जुलाई, 2018 से शुरू हुआ.

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