अबला कहो या सबला समाज नहीं बदला
Sarita|November Second 2020
समाज में बदलाव के बावजूद महिलाएं संघर्ष में जीती हैं. इस का बड़ा कारण हजारों वर्षों से जमी पुरुषसत्तारूपी गंदगी है. धार्मिक स्थलों व धर्म के ठेकेदारों से इसे बराबर खादपानी मिलता रहता है. यही कुतर्क महिलाओं से सहमति उगलवा कर उन के लिए अड़चन बन जाते हैं.
प्राची भारद्वाज

समाज ने औरतों को एक अबला, हलकीफुलकी, कोमल, कमजोर और भावनात्मक प्राणी के रूप में स्वीकारा हुआ है. यही उन की छवि है, , यही उन की नियति. उन्हें मजबूत बाजुओं की तमन्ना रहती है. दादीनानी द्वारा सुनाई परियों की लगभग हर कहानी में एक राजकुमार सफेद घोड़े पर आता है और बेचारी, हालात की मारी राजकुमारी को बचा कर अपने साथ ले जाता है. इसी सपने के साथ बड़ी होती लड़कियां मुसीबत के समय में किसी न किसी मर्द की राह ताकने लगती हैं.

लड़कियों के पास वह क्या चीज है जिस की इतनी हिफाजत करनी पड़ती है? इस प्रश्न का सीधासरल उत्तर है, उन का कौमार्य. यही है उन की इज्जत, यही है पूरे परिवार की इज्जत और यही है जिस के भंग होते ही स्त्री का पूरा जीवन बरबाद समझा जाता है. अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रही', 'मैं तुम्हें मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही...' ऐसे न जाने कितने संवाद आप ने हीरोइनों के मुंह से हिंदी फिल्मों में सुने होंगे. इज्जत लुट जाने पर हीरोइन हो या आम लड़की, आत्महत्या करना उस के लिए एक सुस्पष्ट कदम है.पर क्या कभी आप ने ये बातें किसी हीरो के मुंह से सुनी?

कोई भी धर्म हो, हिंदू, इसलाम, ईसाई या फिर यूनानी, हर धर्म में कौमार्य को तथाकथित भगवान सरीखी मान्यता प्राप्त है. हिंदुओं में कुंआरी कन्या को देवी का दरजा दे कर आज भी कन्यापूजन की प्रथा निभाई जाती है.ईसाइयों में मां मैरी कुंआरी होते हुए भी यीशु की मां बनीं. यूनानी कथाओं के अनुसार, कुंआरी कन्या की बलि से भगवान, यदि कहीं है, को प्रसन्न किया जाता था. इसलाम में यदि एक औरत शादी से पहले अपना कौमार्य खो देती है तो उस को प्रताड़ित किया जाता है. यहां तक कहा जाता है कि यह खून इतना पवित्र होता है कि इस से कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है. हालांकि, इस बात के पीछे कोई तथ्य, कोई वैज्ञानिक स्रोत नहीं है.

अर्थ स्पष्ट है कि स्त्री के लिए उस के कौमार्य को हर धर्म, हर समुदाय सब से कीमती गुण मानता है. इसी का परिणाम यह है कि आज भी सुहागरात को बिस्तर पर पहले सहवास के पश्चात खून के धब्बे ढूंढ़े जाते हैं.

क्यों यह समाज लड़की को अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों से जीने में अड़चन पैदा करता है?

पुरुष के लिए संबंध बनाने की कोई लक्ष्मणरेखा नहीं है. उस की मरजी वह कितनी भी औरतों से संबंध बनाए. 'संजू' फिल्म में दर्शाया गया कि अभिनेता संजय दत्त के असल जीवन में 300 से भी अधिक औरतों से संबंध रहे हैं. पूरे समाज ने इस तथ्य को हंस कर स्वीकारा. लेकिन सोचिए, इस की जगह यदि कोई स्त्री ने इस बात को स्वीकारा होता तब?

पूरे वजूद पर भारी एक पतली सी झिल्ली

बेटियां पराया धन होती हैं, किसी और की अमानत होती हैं. और इस अमानत को बेहद होशियारी से सहेज कर रखना होता है. भोपाल की वैष्णवी बताती हैं कि कुंआरेपन में उन्हें कहीं भी अकेले आनेजाने की इजाजत नहीं थी, यहां तक कि सहेली के घर या कालेज आनेजाने के लिए भी पिताभाई की ड्यूटी लगती थी. कारण वही एक है. लड़की की वर्जिनिटी को बचाए रखना होता है क्योंकि यही एक पैमाना है उस की शुद्धता का. सामाजिक रीतियां माने, तो कुंआरी लड़की के लिए उस की सुरक्षा की बात से ऊपर कुछ भी नहीं होता. उस के सपने, उस की इच्छाएं, उस की आशाएं, उस की काबिलीयत, उस की कुछ करने की क्षमताएं आदि कुछ भी नहीं. बस, एक पतली सी झिल्ली, जिसे वैज्ञानिक भाषा में हम हाइमन कहते हैं, पूरे के पूरे स्त्रीत्व से अधिक शक्तिशाली हो जाती है. आखिर क्यों?

90 प्रतिशत लड़कियों को पहली बार सैक्स करने के दौरान खून नहीं आता. पर अभी भी कई ऐसे मर्द हैं जो नएनए पति बनने पर आनंद के खास पलों में एकदूसरे में खो जाने से ज्यादा जरूरी ब्लड स्टेन ढूंढ़ना समझते हैं. इस के न होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. टैम्पोन का इस्तेमाल, घुड़सवारी, साइक्लिग, यहां तक कि व्यायाम की वजह से भी यह झिल्ली हट सकती है. यह भी हो सकता है कि लड़की की झिल्ली जन्म के समय से ही न हो, या फिर लचीली होने की वजह से टूटी ही न हो.

औरत तेरी यही कहानी

'औरत तेरी यही कहानी, आंचल में दूध, आंखों में पानी.' यह जुमला कितना भी पुरातन हो चला हो परंतु अफसोस कि सच अब भी है. औरतों को चुप रहने की, सहने की शिक्षा जन्म से दी जाती है. चाहे वह मुंह दबा कर हंसना हो, पीरियड्स का दर्द चुपचाप सहना हो या फिर अपनी कामनाओं का गला घोंटना. अपनी इच्छाओं का साथ देने वाली औरत स्वार्थी, अपनी कामनाओं को व्यक्त करने वाली औरत बेहया और अपनी उन्नति की चाह रखने वाली औरत लड़ाकी व अवसरवादी, और अकसर चरित्रहीन भी बना दी जाती है.

औरत को नौकरी में तरक्की मिले, तो सुंदर चेहरे या आकर्षक शरीर को उस का श्रेय बड़ी आसानी से दे देता है यह समाज. मानो, उस की अपनी कोई काबिलीयत हो ही नहीं सकती. अगर सुंदर है तो दिमाग से पैदल होगी, जैसे ब्यूटी विद ब्रेस एक नापाक चीज है.

चुटकलों में या फिर मीम्स बनते हैं कि पति पत्नी के आगे चूहा सरीखा है लेकिन असली जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं है.

कौर्पोरेट वर्ल्ड में औरतों के लिए आगे बढ़ना बेहद कठिन है. एक पद तक औरतें पहुंच सकती हैं. लेकिन उस के ऊपर उठना बहुत मुश्किल. जहां कहीं रिबन कटना होगा, वहां ट्रे में कैंची लिए औरत ही खड़ी मिलेगी. औफिस में आए मेहमानों को गुलदस्ता पकड़ाना केवल महिला कर्मचारी के पलड़े में आता है. कमर्चारियों के लिए दीवाली की शौपिंग हो या पार्टी और्गेनाइज करना, वहां औफिस की औरतों को खुशी से आगे कर दिया जाता है लेकिन जहां बात बोर्ड मैंबर बनने की आती है, वहां वे पीछे धकेल दी जाती हैं. उन की औकात सैक्रेटरी, एयरहोस्टेस, नर्स, ब्यूटीशियन, शिक्षिका आदि तक ही सीमित रहती है. निर्णायक स्थिति में उन्हें मौके नहीं मिलते.

केवल खूबसूरत शरीर

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