पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव केंद्र के प्रति डगमगाता विश्वास
Gambhir Samachar|May 16, 2021
लोकतंत्र है और चुनावों में हार जीत तो चलती ही रहती है लेकिन 2017 में विधानसभा की 3 सीटें और फिर 2019 में लोकसभा की 18 सीटों से बढ़ते हुए बीजेपी का आंकड़ा 2021 के विधानसभा चुनावों में 70 के पार कर गया है. इसलिए ये तो साफ है कि बंगाल में खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. बीजेपी ने बंगाल में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं.
प्रज्ञा प्रतीक्षा तिवारी

बंगाल छोड़ बाकी सभी राज्यों के नतीजे क्या कहते हैं, ये बेमानी हो गया है. क्योंकि बाकी सभी के नतीजे लोगों के जुबान पर थे. लेकिन बंगाल के नतीजों का पोस्टमार्टम जरुरी है क्योंकि केन्द्र की सत्तारुढ़ पार्टी बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी और उन्हें भरोसा भी था कि वो सत्ता की दहलीज तक पहुंच ही जाएंगे. लेकिन हुआ ठीक इससे पलट. ममता दीदी की जड़ें कितनी मजबूत हैं इसका अंदाजा शायद बीजेपी आलाकमान नहीं लगा पाया या फिर कहीं को रणनीति मे चूक हो गयी. जीत का सेहरा बांधने के लिए तमाम दावेदार तैयार खड़े होते हैं लेकिन हार का कोई नामलेवा नहीं मिलता. इसलिए सिलसिलेवार ये जानना जरुरी है कि आखिर नतीजे बीजेपी आलाकमान के मन मुताबिक क्यों नहीं आए.

कोरोना संकट के बीच 2 मई को पश्चिम बंगाल, केरल, असम सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. इनमें असम में बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने के साथ-साथ बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी है. ममता बनर्जी ने खुद हारने के बावजूद बंगाल की सत्ता में बीजेपी के अरमानों पर पानी फेर दिया है. वहीं, दक्षिण भारत के तमिलनाडु में डीएमके के हाथ सत्ता लगी तो केरल में पिनराई विजयन का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम साबित हो रही है. पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में 10 बड़े सियासी संदेश छिपे हुए हैं.

1. विपक्षी राजनीति के नए समीकरण पश्चिम बंगाल में अगर टीएमसी जीती और कांग्रेस को असम और केरल में सफलता नहीं मिली तो इससे विपक्ष की राजनीति में नए समीकरण पैदा होंगे. विपक्ष में चुनाव से पहले ही एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के नेतृत्व में एक मंच पर आने की मुहिम शुरू हुई है. इससे पहले शिवसेना ने सार्वजनिक तौर पर पवार के नेतृत्व की वकालत की है. कांग्रेस की मुश्किल यह है कि पार्टी में गांधी परिवार पहले से अपनों के निशाने पर हैं और अब पांच राज्यों में मिली चुनाव हार से और निशाने पर होगी. ऐसे में गैरकांग्रेसी चेहरे की अगुवाई में विपक्ष को एक मंच पर लाने की मुहिम शुरू होगी. ऐसे में ममता बनर्जी विपक्ष की ओर से पीएम मोदी के खिलाफ एक बड़ा चेहरा साबित हो सकती हैं.

2. छत्रपों का वर्चस्व बरकरार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से छत्रप अपने सियासी किले को बचाए रखने में कामयाब रहे हैं. बंगाल में ममता बनर्जी और केरल में पिनराई विजयन अपनी-अपनी सत्ता को बचाए रखने में कामयाब रहे हैं. तमिलनाडु में एमके स्टालिन की अगुवाई में डीएमके गठबंधन की दस साल के बाद सत्ता में वापसी हो पाई है. इन तीन ही राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने जीत दर्ज की है और बीजेपी का बंगाल में 80 सीटों के नीचे सिमट जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे रहा है. इससे साफ जाहिर होता है कि मोदी का जादू छत्रपों के सामने नहीं चल सका.

3. कांग्रेस में मचा सियासी घमासन कांग्रेस बीते करीब एक दशक में अर्श से फर्श पर आ गई है. गांधी परिवार पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के निशाने पर हैं और अब पांच राज्यों के चुनाव में पार्टी के लचर प्रदर्शन के चलते गांधी परिवार के प्रति सवाल खड़े हो सकते हैं. बंगाल में कांग्रेस का खाता न खुलना, असम-केरल में करारी मात और पुडुचेरी में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी में एक बार फिर उठापटक के आसार बढ़ गए हैं, क्योंकि पार्टी के असंतुष्ट समूह (जी-23) के नेताओं की ओर से कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते आधार को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे. ऐसे में पार्टी का यह विद्रोही ग्रुप एक बार फिर से मोर्चा खोल सकता है. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए पार्टी के मौजूदा हालात को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देना भी इन नतीजों के बाद आसान नहीं होगा.

4. क्षेत्रीय दलों के प्रभाव से कांग्रेस की चुनौती कांग्रेस के सामने अपनी अंदरूनी सियासी चुनौती में भारी इजाफे के साथ ही अब राज्यों में ज्यादा मजबूत होकर उभरे क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक प्रभाव को थामने की दोहरी चुनौती होगी. बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन के मजबूत होने से साफ हो गया है कि एक ओर जहां सूबों में कांग्रेस का सियासी आधार लगातार घट रहा है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय पार्टियां व उनके नेता राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी राजनीति में उसकी जगह के लिए बड़ा खतरा बनते नजर आ रहे हैं.

5. दक्षिण में अभी भी बीजेपी का असर नहीं दक्षिण भारत के तीन राज्यों में केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए हैं. केरल में भाजपा अपना खाता भी नहीं खोल सकी है जबकि तमिलनाडु में AIADMK के साथ मिलकर भी कोई बड़ा सियासी करिश्मा दिखाने में सफल नहीं हुई. बीजेपी तमिलनाडु में 20 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरी थी, जिनमें से वह 4 सीट जीतने में ही कामयाब रही है. हालांकि, पुडुचेरी में जरूर बीजेपी सफल रही है, लेकिन बाकी दक्षिण के राज्यों में जिस तरह से पार्टी का खाता नहीं खुला है. इससे साफ जाहिर होता है कि दक्षिण में बीजेपी के लिए अभी भी सियासी जमीन बनाना आसान नहीं है?

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