भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में नवरात्रि का महत्त्व
Sadhana Path|October 2021
पहली शैलपुत्री कहलावे, दूसरी ब्रह्मचारिणी मन भावें, तीसरी चंद्रघंटा शुभनाम, चौथी कुष्मांडा सुखधाम, पांचवीं देवी स्कंदमाता, छठी कात्यायनी विख्याता, सातवीं कालरात्रि महामाया, आठवीं महागौरी जगजाया, नवमी सिद्धिदात्रि जग जानें, नवदुर्गा के नाम बखाने।

'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

' शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण नवदुर्गा का सर्वप्रथम स्वरूप शैलपुत्री कहलाया। शैलपुत्री की नवरात्रि में प्रथम दिन पूजा की जाती है। ये वृषवाहना शिवा ही हैं। घोर तपश्चर्या वाली तपश्चारिणी दुर्गा का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी कहलाया। नवरात्रि के दूसरे दिन इनकी पूजा का विधान है। अक्षमाला व कमंडल धारिणी सिद्धि व विजय देती हैं। घंटाकार चंद्र मस्तक पर धारण करने वाली माता चंद्रघंटा कहलाती हैं। तीसरे दिन नवरात्रि में इनकी पूजा करने से भक्तों का इहलोक एवं परलोक में कल्याण होता है। यह चंद्रसम शीतलदायी हैं। पिंड और ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली देवी कुष्मांडा हैं। यह दुर्गा जी का चतुर्थ स्वरूप हैं इसलिए नवरात्रि में चतुर्थी को इनकी पूजा होती है। यह रोग, शोक का नाश करके आयु, यश और बल प्रदान करती हैं। स्कंद की माता होने के कारण स्कंदमाता कहलाने वाली देवी की नवरात्रि की पंचमी तिथि को पूजा अर्चना का विधान है। यह गोद में स्कंददेव को लिए रहती हैं। सदा शुभ फलदायिनी हैं। कात्यायन सुता कात्यायनी नवदुर्गा का छठा स्वरूप है। इनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को छठे दिन की जाती है। यह दानवघातिनी देवी शुभ फल प्रदान करती हैं। काल का नाश करने वाली देवी कालरात्रि की पूजा नवरात्रि में सातवें दिन की जाती है। गर्दभारूढा, कराली, भयंकरी, कृष्णा, कालरात्रि माता डरावनी होने पर भी भक्तों उनकी असीम कृपा रहती है। धन ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी, त्रैलोक्य मंगला, तापत्रयहारिणी माता का अष्टम स्वरूप महागौरी है। आठ वर्ष की आयु की होने के कारण आठवें दिन नवरात्रि में इन्हें पूजने से सदा सुख शांति देती हैं। अष्ट सिद्धियां प्रदान करने वाला माता का नवम स्वरूप सिद्धिदात्री कहलाता है। नौवें दिन जो नवरात्रि का अंतिम दिन है, सिद्धिदात्री की पूजा उपासना करने का विधान है।

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