अष्टविनायक की आराधना
Sadhana Path|September 2021
महाराष्ट्र में अष्टविनायक को कौन नहीं जानता, लेकिन विदर्भ के अष्टविनायक मंदिर के बारे में बहुत कम लोग ही बता पाएंगे। जानें विदर्भ के अष्टविनायक को विस्तार से।
सुधीर जोशी

भारतीय देवमंडल में प्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश की आराधना के कई रूप दिखायी देते हैं। इन्हीं रूपों में से एक अष्टविनायक को महाराष्ट्र में विशेष स्थान प्राप्त है। हर वर्ष महाराष्ट्र में 10 दिवसीय गणेशोत्सव का आयोजन किया जाता है। अष्टविनायक की आराधना भक्ति भाव के साथ वर्ष भर की जाती है। अष्टविनायक के दो स्वरूपों को मान्यता दी गई है। इन रूपों में विदर्भ के अष्टविनायक तथा पुणे और रायगढ़ के अष्टविनायक का समावेश है।

पश्चिम महाराष्ट्र में गणपति के आठ प्रख्यात मंदिर हैं। दंडक राजा की कर्मभूमि कहे जाने वाले विदर्भ को प्राचीन काल में 'दंडकारण्य' नाम से संबोधित किया जाता था। इतिहास और प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन करने पर विदर्भ में वाकाटक के शासन काल से भगवान श्रीगणेश की आराधना किए जाने का उल्लेख मिलता है। उसी समय विदर्भ के अष्टविनायक की आराधना का जिक्र भी मिला है।

स्वामी विघ्नेश गणेश (आदसा, कलमेश्वर)

विदर्भ के अष्टविनायक में दर्शन का पहला मान नागपुर जिले की कमलेश्वर तहसील के आदसा नामक गांव में स्थित श्री महागणेश को प्राप्त है, इस गणेश मंदिर का निर्माण पत्थर से किया गया है। इस परिसर में महादेव, भैरव तथा हनुमान के भी मंदिर हैं। मूर्ति नृत्य मुद्रा वाली तथा संधारा प्रकार की है। परिसर में बारह ज्योतिर्लिंग भी बनाए गए हैं। वामन पुराण में इस गांव का नाम अदोष क्षेत्र बताया गया है। गणपत्य संप्रदाय के श्रद्धालुओं के लिए इस स्थान का विशेष महत्त्व है।

चिंतामणि गणेश (कलंब)

नागपुर-यवतमाल राज्य महामार्ग नंबर-3 पर यवतमाल से 20 किलोमीटर दूरी पर कदंबपुर नामक प्राचीन नाम वाला यह मंदिर है। सर्व चिंता से मुक्ति देने वाले गणेश मंदिर के रूप में इसका विशेष महत्त्व है। जमीन के अंदर 10 मीटर दूरी पर स्थित इस मंदिर में स्थापित इस मूर्ति पर सिंदूर लगा हुआ है। मंदिर में स्थित कुएं के पानी में औषधीय गुण होने का दावा भी किया जाता है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मंदिर स्थित कुएं के पानी से सभी प्रकार के त्वचा रोग दूर हो जाते हैं। हर 12 वर्ष में इस कुएं के जल का स्तर बढ़ता है और वह जल भगवान गणेश जी की मूर्ति तक आता है।

एकचक्र सिद्धिविनायक (केलजर, वर्धा)

नागपुरवर्धा राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक 3 पर वर्धा जिले के केलजर मंदिर है। मुगल काल में इस गांव को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ है। महाभारत में बकासुर के संदर्भ में केलजर का उल्लेख मिलता है। कुछ दिनों तक इस गणेश मंदिर में भैंसा की बलि देने की प्रथा बेरोकटोक जारी थी, लेकिन अब इस कुप्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग चुका है। मंदिर में सवा मीटर ऊंची गणेशमूर्ति स्थापित की गई है, यह मूर्ति पूरी तरह से सिंदूर से व्याप्त है। मूर्ति की सूंड दायी ओर घूमी हुई है। यह मूर्ति नृत्य मुद्रा में होने के कारण शोधार्थियों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।

अष्टादशभुजा गणेश (रामटेक)

नागपुर से 47 किलोमीटर दूरी पर स्थित रामटेक नामक तीर्थक्षेत्र में 18 हाथ वाले श्रीगणेश का अति प्राचीन मंदिर है। डेढ़ मीटर ऊंची यह गणेश मूर्ति पद्मासन में आसीन है। भंडारा जिले से इस देवस्थान तक पहुंचने के लिए 1.30 घंटे लगते हैं। रामटेक शहर के शिवाजी वार्ड में स्थित इस मंदिर में गणेशोत्सव के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर में विदर्भ क्षेत्र में आने वाले सभी अष्टविनायक मंदिरों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई है। नागपुर तथा भंडारा से लगभग समान दूरी पर स्थित इस मंदिर को जागृत मंदिर का दर्जा प्राप्त है।

टेकड़ी गणगति (नागपुर)

विदर्भ के अष्टविनायक में नागपुर के वरद विनायक को विशेष तौर पर ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है। यह गणपति टेकड़ी के रूप में प्रसिद्ध है। यह 12वीं शताब्दी में यादवकालीन राज के कार्यकाल की स्वयंभू मूर्ति है। इस मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति दाये सूंड की है। सामाजिक कार्यों के लिए इस मंदिर को मिली धनराशि का उपयोग किया जाता है।

वरद विनायक (गौराला, भद्रावती, चंद्रपुर) )

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