भारतीय संस्कृति का महापर्व 'कुंम्भ'
Sadhana Path|February 2021
कुम्भ हमारी भारतीय संस्कृति का अत्यंत प्राचीन महापर्व है, जो कि बारह साल में एक बार आता है। इस बार यह 15 जनवरी से 4 मार्च 2019 तक प्रयाग (इलाहाबाद) में मनाया जाएगा। कुम्भ हमारी संस्कृति के साथसाथ हमारी आस्था का भी प्रतीक है। महाकुम्भ का अर्थ क्या है? क्यों यह बारह साल में एक बार आता है तथा इसका सांस्कृतिक महत्त्व क्या है? जानिए इस लेख से।
शशिकांत 'सदैव'

कुम्भ पर्व विश्व में किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है। कुम्भ का संस्कृत में अर्थ हैकलश ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। कलश यानी 'घट' अर्थात घड़ा। आस्था कहती है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश को दानवों से बचाने के लिए दैवीय शक्तियां 12 दिन तक उसे ब्रह्मांड में छिपाने की कोशिश करती रहीं। इस दौरान उन्होंने जिन-जिन स्थानों पर अमृत कलश को रखा, वे स्थान कुम्भ के स्थान हो गए।

महाकुंभ की महिमा

मान्यता है कि जो पुण्य कार्तिक माह में हजार बार गंगा स्नान से प्राप्त होता है, माघ माह के सौ स्नान एवं वैशाख में एक लाख नर्मदा स्नान करने पर जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य कुम्भ पर्व में एक स्नान से प्राप्त होता है।

स्कंद पुराण के अनुसार

गोदाया यक्तलं प्रोक्तं द्विगुण भवेत,

चतुर्गुणंतु सिंहस्थ ह्यतिच रेतुषद गुण

अर्थात्, गोदावरी में स्नान एवं दान करने का जो पुण्य प्राप्त होता है वह संगम स्थल पर दोगुने रूप में प्राप्त होता है। यही पुण्य सिंहस्थ में चौगुने रूप में प्राप्त होता है। यदि सिंहस्थ में बृहस्पति का परिभ्रमण हो तो यह षट् गुण रूप में प्राप्त होता है। कुम्भ स्नान की शास्त्रों में खूब महिमा गान है।

अश्वमेघ सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च,

लक्षं प्रदक्षिण भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम्।

अर्थात्, हजार बार अश्वमेघ यज्ञ करने से, 100 बार वाजपेयी यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है वही फल एक बार कुम्भ स्नान करने से मिलता है।

तान्येवयः पुमान,योगेसोमृतस्वायकल्पते,

देवा नमति तत्रस्थान, यथा रग्डा धनाधिपान।

अर्थात्, मनुष्य कुम्भ योग में स्नान करता है, वह अमरत्व यानी मुक्ति की प्राप्ति करता है। जिस प्रकार दरिद्र मनुष्य धनवान को नम्रतापूर्वक अभिवादन करता है ठीक उसी प्रकार कुम्भ पर्व में स्नान करने वाले मनुष्य को देवगण नमस्कार करते हैं।

क्यों लगता है कुम्भ मेला?

कुम्भ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुम्भ से अमृत बूंदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए थे तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर सभी देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुम्भ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस युद्ध के दौरान जयंत ने अमृत कलश को उसकी सुरक्षा हेतु 12 स्थानों पर रखा, जिससे अमृत की कुछ बूंदे कलश रखे जाने वाले स्थानों पर गिरी। इन 12 स्थानों में से 8 स्थान स्वर्ग में स्थित एवं 4 स्थान पृथ्वी पर स्थित प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक थे। इसीलिए इन चारों स्थानों पर प्रत्येक 12 वर्ष के पश्चात महाकुम्भ का मेला आयोजित किया जाता है। स्कन्द पुराण' में यह भी कहा गया है कि देवताओं व दानवों का युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को देवताओं में बांट दिया परंतु एक दानव देव रूप धारण कर अमृत पीने में सफल हो गया।' इस पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया। अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमा ने विशेष सहायता की थी। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया, चन्द्रमा ने कलश से अमृत को गिरने से रोका और बृहस्पति ने अमृत कलश को राक्षसों के पास जाने से रोका। यही कारण है कि सूर्य, बृहस्पति और चन्द्र ग्रहों के विशिष्ट संयोग से ही कुम्भ महापर्व का योग बनता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहां-जहां अमृत बूंद गिरी थी, वहां-वहां कुम्भ पर्व होता है।

कब और कहां लगता है कुम्भ मेला?

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