ज्ञान का स्वामित्व और नाटक प्रक्रिया
Shaikshanik Sandarbh|November - December 2020
'ज्ञान का स्वामित्व' जिसके अन्तर्गत ये माना जाता है कि एक बच्चा अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करता है, की रोशनी में, नाटक की प्रक्रिया में इसको हासिल करने के कुछ अनुभव और उनपर चर्चा।
मौअज्जम अली

ज्ञान का स्वामित्व' के क्या मायने हैं? इस प्रश्न को शिक्षा में कार्य करने वालों तथा शिक्षकों से पूछे जाने पर यह बात निकलकर आती है कि "अनुभवात्मक प्रक्रिया में जाकर जब किसी बच्चे या बच्चों के समूह द्वारा स्वयं अपने ज्ञान का निर्माण किया जाता है, और उन्हें स्वयं भी यह मालूम होता है कि उन्होंने इस ज्ञान को अपने अनुभव और समझ से प्राप्त या निर्मित किया है, यह हमारा स्वयं का निर्मित ज्ञान है और हम अपने शब्दों में इसे व्यक्त या उसकी व्याख्या कर सकते हैं तो उसे 'ज्ञान का स्वामित्व' कहा जा सकता है।"

यह जरूरी नहीं कि इससे पहले किसी को वह ज्ञान नहीं था बल्कि यह ज्ञान पहले से भी विद्यमान हो सकता है, बस इस बार इसे स्वयं हासिल किया गया है। इसको एक उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है कि हमने किसी स्थान या इमारत या वस्तु के बारे में बहुत सुना है। इसे चित्रों में भी देखा है, इसके बारे में पढ़ा भी है तो हम इसके बारे में बहुत-सी जानकारी रखते हैं। अगर कोई इसके बारे में कुछ पूछता है तो हम वही बात बताते हैं जो हमने पढ़ी या सुनी है। हाँ, ये बात और है कि इन जानकारियों को हम अपने शब्दों में भी बयान कर सकते हैं लेकिन उस जगह पर जाने, अपनी आँखों से देखने या अपने हाथों से छूने के एहसास को हम बयान नहीं कर सकते।

किसी जगह पर जाकर, किसी इमारत को अपनी आँखों से देखकर, या किसी वस्तु को अपने हाथों से छूकर, चखकर या सूंघकर जो अनुभवात्मक अनुभूति होती है, उसे केवल जानकारियों से नहीं समझा जा सकता है। हाँ, हम अपने पूर्वज्ञान के आधार पर कुछ अन्दाज़ ज़रूर लगा सकते हैं। तथ्यात्मक जानकारियों को तो पूर्ण विश्वास के साथ साझा किया जा सकता है परन्तु अनुभवात्मक अनुभूति या एहसास को इसकी गैरहाज़री में बहुत विश्वास के साथ वर्णित नहीं किया जा सकता। मगर इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हर ज्ञान अनुभव के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। हाँ, अनुभव उसको एहसास से लिपटे अपने शब्द ज़रूर मुहैय्या कराता है।

वैसे तो रचनावाद की प्रक्रिया अपनाते हुए किसी भी शिक्षण विधि द्वारा कक्षा में इस बात को स्थापित करना कठिन है कि बच्चों ने अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं किया है और वे इस पर अपना स्वामित्व भी रखते हैं, लेकिन यहाँ अपने शिक्षण अनुभव के आधार पर हम नाटक की प्रक्रिया में इसकी सम्भावना की छानबीन करेंगे।

शिक्षा में नाट्यकला के क्षेत्र में कार्य करने वाले अभ्यासकारों और विद्वानों जैसे गैबिन बोल्टन और डोरोथी हीथकोट ने शिक्षा में नाट्यकला को दो भागों में विभाजित किया है प्रस्तुति नाटक और प्रक्रिया नाटक। प्रस्तुति नाटक में कक्षा में बच्चों के साथ नाटक को दर्शकों के समक्ष कला के तौर पर प्रदर्शन के उद्देश्य से तैयार किया जाता है, और प्रक्रिया नाटक में कक्षा में बच्चों के साथ नाटक से जुड़ी सभी प्रक्रियाएँ शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सीखने के आशय से की जाती हैं जिसमें प्रदर्शन के लिए कोई स्थान नहीं होता।

इस आधार पर ‘ज्ञान के स्वामित्व' में नाटक प्रक्रिया की भूमिका को सोचा जाए तो प्रस्तुति नाटक की बजाए प्रक्रिया नाटक की कक्षा के ऐसे कई उदाहरण दिमाग में गूंजते हैं, जिसके आधार पर विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि प्रतिभागी या प्रतिभागियों ने 'ज्ञान का स्वामित्व' हासिल किया। लेकिन इससे पहले प्रक्रिया परक नाटक की अवधारणात्मक समझ बनाने का प्रयास करते हैं।

प्रक्रिया नाटक की अवधारणा

प्रक्रिया नाटक एक ऐसी गतिशील एवं सशक्त कार्यप्रणाली है जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी एक साथ मिलकर काम करते हुए एक काल्पनिक दुनिया का निर्माण करते हैं तथा इस काल्पनिक दुनिया के रहते हुए किसी समस्या, परिस्थिति, विषय, घटना या घटनाओं की श्रृंखला आदि की जाँच-पड़ताल और विश्लेषण करते हैं। यह प्रक्रिया दर्शकों के लिए प्रदर्शन को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि खुद की समझ को विकसित करने एवं विचारों या ज्ञान का निर्माण करने के लिए की जाती है।

इस नाटक प्रक्रिया में विद्यार्थी अपने अनुभव के आधार पर जीवन से जुड़ी बहुत-सी भूमिकएँ निभाते हैं तथा इस भूमिका निभाने की प्रक्रिया में किसी और के जीवन को जीते हुए उस पर सोचने, समझने व अन्दाज़ा लगाने की कोशिश करते हैं। साथ ही, अन्य बहुत-सी चिन्तनशील गतिविधियों में संलग्न होते हुए पहले से स्थापित खुद के दृष्टिकोण से परे सोचने एवं एक ही मुद्दे पर विभिन्न परिप्रेक्ष्य बनाने का प्रयास करते हैं।

प्रक्रिया नाटक के अन्तर्गत यह प्रयास किया जाता है कि प्रतिभागी वास्तविक दुनिया से हासिल समझ, विचार, अनुभव, परिस्थिति को लेकर एक काल्पनिक दुनिया का निर्माण करे और इस प्रक्रिया में इनकी पुन: रचना करते हुए एक अनुभवात्मक समझ या ज्ञान का निर्माण करे और उस ज्ञान पर स्वामित्व हासिल करे।

'ज्ञान के स्वामित्व' को समझने के लिए पहले, 'ज्ञान क्या है?' को समझना होगा। इस विषय पर बहुतसे दार्शनिकों और अभ्यासकर्ताओं ने ज्ञान को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बाँटकर समझने की कोशिश की है, 'सैद्धान्तिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान।' इसी सन्दर्भ में लेमोस नोह की किताब एन इंट्रोडक्शन टू थियरी ऑफ नॉलेज की व्याख्याओं को समझते हैं जिसमें लेखक ने ज्ञान को तीन हिस्सों में बाँटा है।

1. सैद्धान्तिक ज्ञान

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