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संघर्ष के चक्र में शांति की चुनौतियां
Jansatta
|July 14, 2025
अर्थशास्त्र और शांति संस्थान के वैश्विक शांति सूचकांक 2025 में 0.36 फीसद की गिरावट दर्शाती है कि 163 देशों में से अधिकांश में अशांति है और वे संघर्ष तथा अस्थिरता की बढ़ती तपिश का सामना कर रहे हैं, जबकि कुछ ही राष्ट्र स्थिरता की राह पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में युद्धोन्माद, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक विषमताएं और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण ने मानवता की नींव को गहरे संकट में डाल दिया है।
अर्थशास्त्र और शांति संस्थान की ओर से प्रकाशित वैश्विक शांति सूचकांक 2025 में दर्ज 0.36 फीसद की कमी को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सबसे गंभीर गिरावट माना जा रहा है। यह मानवीय चेतना के क्षरण और अंतरराष्ट्रीय विश्वास के टूटने का प्रतिबिंब है। यह गिरावट दर्शाती है कि 163 देशों में से अधिकांश संघर्ष और अस्थिरता की बढ़ती तपिश का सामना कर रहे हैं, जबकि कुछ ही राष्ट्र स्थिरता की राह पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
वैश्विक शांति में यह गिरावट केवल समकालीन सैन्य टकराव या सीमा-संघर्ष तक ही सीमित नहीं, बल्कि यह बहुआयामी संरचना का विचलन है, जिसमें जसमें शासन की गुणवत्ता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं, मानवाधिकारों की सुरक्षा, आर्थिक अवसरों का न्यायसंगत वितरण और सूचना पारदर्शिता शामिल हैं। जब तक ये सभी तत्त्व संतुलित तरीके से मौजूद नहीं होंगे, तब तक शांति केवल एक आकांक्षा ही बनी रहेगी। पिछले सत्रह वर्षों में औसतन 5.4 फीसद की गिरावट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रणनीतिक समझौते और सैन्य क्षमता निर्माण जैसे पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक बदलाव की आवश्यकता है, जो विश्वास निर्माण, पारस्परिक सम्मान और सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित हो।
भारत इस सूचकांक में 115वें स्थान पर है, जिसे इस बार 2.314 अंक मिले हैं। देश में पिछले वर्ष की तुलना में 0.58 फीसद का सुधार दर्शाता है कि आंतरिक सुरक्षा उपायों, सीमा प्रबंधन और राजनीतिक स्थिरता में किए गए प्रयासों का आरंभिक प्रभाव दिखने लगा है। हालांकि, यह सुधार तब तक पर्याप्त नहीं माना जा सकता, जब तक सामाजिक असमानता, जातीय व धार्मिक विभाजन और सूचना संकट जैसी चुनौतियों का मूल रूप से समाधान नहीं किया जाता। विविधता में एकता की हमारी परंपरा तभी सफल हो सकती है, जब हर समुदाय को समान अधिकार, सांस्कृतिक स्वायत्तता दी जाए और राष्ट्रीय एकता को व्यक्तिगत और सामूहिक सुरक्षा का पर्याय माना जाए।
Dit verhaal komt uit de July 14, 2025-editie van Jansatta.
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