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शिक्षा की गुणवत्ता और दायित्व का बोझ
Jansatta Lucknow
|December 16, 2025
शिक्षकों की जिम्मेदारियों को लेकर बहस लंबे समय से चल रही है, विशेष रूप से जब उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है। इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है, बल्कि शिक्षकों का मानसिक स्वास्थ्य और कार्य संतुलन भी प्रभावित होता है।
भारत में शिक्षकों की भूमिका और उनकी जिम्मेदारियों को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है, विशेष रूप से तब, जब उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है।
देश के विभिन्न राज्यों में शुरू की गई मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रिया में भी शिक्षकों को बूथ स्तरीय अधिकारी के तौर पर शामिल किया गया है। इसलिए यह बहस नए सिरे से राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई है। ऐसी खबरें आईं कि काम के दबाव से कई बूथ स्तरीय अधिकारियों की मौत हो गई। जिनमें हृदयाघात, तनाव और आत्महत्या जैसे कारण बताए गए। ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक समस्या का संकेत हैं, जो बताती है कि देश में शिक्षा के संवाहक कहे जाने वाले शिक्षकों को प्रशासनिक प्रणाली के सामान्य कर्मियों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि शिक्षकों का सम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और कार्य संतुलन भी प्रभावित होता है। कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल में रंगमाटी पंचायत की एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान हो गई। गुजरात में एक शिक्षक ने पत्र लिखकर कहा कि वे लगातार थकान और मानसिक दबाव से जूझ रहे हैं, इस कारण पुनरीक्षण कार्य को आगे जारी नहीं रख सकते। इस तरह मध्य प्रदेश में एक शिक्षक को प्रतिदिन कम से कम सौ मतदाताओं का सर्वेक्षण करने का लक्ष्य दिया गया था और लापरवाही के आरोप में निलंबन के अगले दिन उनका निधन हो गया। इन घटनाओं से यह सवाल अधिक मुखर होकर सामने आता है कि क्या शिक्षकों की प्राथमिक भूमिका प्रशासनिक कार्यों के बोझ तले दब गई है! यह पहली बार नहीं है जब चुनावी या अन्य गैरशैक्षणिक कार्यों में लगे शिक्षकों को जीवन की कीमत चुकानी पड़ी हो। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और बिहार में कई मतदान कर्मचारियों की लू से मौत हो गई थी, जिनमें शिक्षक भी शामिल थे।
Dit verhaal komt uit de December 16, 2025-editie van Jansatta Lucknow.
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