Poging GOUD - Vrij
भोर की किरण
Sarita
|July First 2025
मां के मन में मानो बरसों का बंधा हुआ बांध टूट कर बह रहा था. उन का पछतावा, उन का दर्द और खालीपन सबकुछ उस दिन आंसुओं संग बह रहा था और उन का चेहरा सहारे के लिए मुझे पुकार रहा था.
सभी कामों से निबट कुछ देर सुस्ता लेने का मन हुआ. कितनी तेज धूप है. सूर्य का उद्दंड प्रखर प्रकाश खिड़कियों के रास्ते कमरे के अंदर तक प्रविष्ट हो गया है. खिड़कियों पर टंगे मोटेमोटे गहरे नीले परदों को खींच, उन का मार्ग अवरुद्ध कर दिया. अहा, अंधेरे कमरे में आंखें मूंद कर रिलैक्स होने का मजा कुछ और ही है. झपकी लगी ही थी कि आंखों में मां का चेहरा उभर आया, दर्द और पीड़ा से भरा, शायद कुछ कहना चाहती थीं.
मन व्याकुल हो गया. फोन उठाया, "हैलो मां, कैसी हो ?"
दूसरी ओर से कमजोर अशक्त स्वर आया, “ठीक हूं बेटा. बस, तू आ जा एक बार, मिल ले आ कर. बोल कब आ रही है ?"
"मां, समझो न, एकदम से घर छोड़ कर निकलना बहुत मुश्किल होता है."
"तुम लोग सब मुझे ही समझाते हो, समझसमझ कर मैं थक गई हूं. तू तो मुझे समझने की कोशिश कर, मेरी लाडो."
मां के स्वर में खीझ और विवशता थी. फोन कट गया था.
झट सुदीप को फोन किया, "सुदीप, मुझे मां के पास जाना है."
"एकाएक, क्यों, क्या हुआ ? ऑल इज फाइन, सब ठीक तो है?" सुदीप के स्वर में चिंता थी.
"कुछ नहीं, बस, मां की तबीयत ठीक नहीं है, बुला रही हैं."
"ओके, आज शाम की ही बुकिंग करा देता हूं. तुम पैकिंग कर लो."
शाम 5 बजे की फ्लाइट है, एक घंटे पहले तो एयरपोर्ट पहुंचना ही होगा. अभी तो 2 बज रहे हैं. जल्दीजल्दी बैग में कपड़े ठूंसे और कैलाशी को आवश्यक निर्देश दे दिए. तब तक कैब भी आ गई थी. फ्लाइट समय पर थी.
फ्लाइट के टेकऑफ के साथ ही विचारों का प्रवाह आरंभ हो गया. दिल में अलग ही बेचैनी. मां, एकाकी, असहाय, अशक्त. उफ्फ यह बुढ़ापा. सारा जीवन बच्चों में लगा दिया. यह सब सोचतेसोचते गालों पर गीलापन महसूस हुआ. धीरे से रूमाल निकाल आंसुओं को ढक लिया. वही जानीपहचानी दिल्ली और दिल्ली की संकरी गलियां. भले ही कोई इन्हें देख कर नाकभौं सिकोड़े लेकिन मेरी तो बांछें खिल जाती हैं. सारा बचपन इन्हीं गलियों में दौड़तेभागते, उछलतेकूदते गुजारा है. रात गहरा रही थी. ऊंघती गलियों ने भी बांहें फैला कर उस का स्वागत किया. गली नंबर 12, मकान नंबर 10, प्रतीक्षातुर दिख रहा है. अधखुले दरवाजे से झांकता प्रकाश अधीरता से बुला रहा है.
औटो से उतर कर छूटे तीर की माफिक सीधे मां के कमरे में पहुंच गई.
Dit verhaal komt uit de July First 2025-editie van Sarita.
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