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परिश्रम से ही कामनाओं की प्राप्ति होगी

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November 2024

ऋग्वेद में प्रत्यक्ष सांसारिक कर्तव्य पालन पर ढेर सारे मंत्र हैं। कृषि कर्म समृद्धिसूचक है। पशुपालन सहज व्यवसाय है। पूर्वजों को गायें प्रिय हैं। पूर्वज उनकी सेवा करते हैं। उन पर हिंसा को अपराध बताते हैं। ऋषि का अनुरोध है 'हे मित्रों! गायों, पशुओं के पानी पीने के बहुत स्थान बनाओ।' आर्य अश्व प्रिय भी हैं। घोड़े पालते हैं।

- हृदय नारायण दीक्षित

परिश्रम से ही कामनाओं की प्राप्ति होगी

मानव अभिलाषा और जिजीवीषा इतिहास रुचिपूर्ण है। ऋग्वेद इतिहास का प्रथम शब्द साक्ष्य है। प्राचीन भारतीय इतिहास का सत्य है और करोड़ों की श्रद्धा। वैदिक काव्य को ईश्वरीय भी कहा जाता है। श्रद्धालु वैदिक मंत्रों को भगवान की वाणी कहते हैं। अनेक विद्वान ऋग्वेद के प्रत्यक्ष भौतिकवाद की उपेक्षा करते हैं। कुछेक विद्वान वेदों को पंथिक आस्था के ग्रन्थ कहने में भी संकोच नहीं करते। श्रद्धा को अंधविश्वास बताते हैं। वे वेदों के सांसारिक यथार्थवाद और दार्शनिक यथार्थवाद की उपेक्षा करते हैं। ऋग्वेद में भरापूरा संसार है। संसार कर्मभूमि है। कर्म अपरिहार्य हैं।

वैदिक पूर्वज सुंदर घर और आनंदमगन परिवार चाहते हैं। वे दूध, दही, अन्न की समृद्धि चाहते हैं। वे देवों से वैराग्य या मोक्ष नहीं मांगते। वे देवों को भी अपने घर बुलाने का निमंत्रण देते हैं। देवों पर प्रश्न भी उठाते हैं। संसार को आनंदित बनाने के लिए कर्म को जरूरी बताते हैं। यहां जांचापरखा वैज्ञानिक विवेक है। वैदिक काल में दर्शन का जन्म और विकास हुआ। सृष्टि रहस्यों की जिज्ञासा भी ऋग्वेद में है। विश्व को एक विराट इकाई देखने की अनुभूति ऋग्वेद में है। दर्शन और विज्ञान की सूक्ष्म विवेचना है। मुख्य बात है प्रत्यक्ष सांसारि यथार्थ। यहां खेती, उद्योग, पशु पालन, घर परिवार और ऋद्धि सिद्धि समृद्धि की सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के प्रयत्न हैं।

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