Poging GOUD - Vrij
डंब फोन का टैंड
Mukta
|July 2025
आज की जनरेशन स्मार्टफोन के साथ पैदा हो रही है. इस के बिना आज कोई भी काम कर पाना मुश्किल सा लगता है. ऐसे में कुछ देशविदेश में लोग डंब यानी कीपैड फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है, क्या यह वाकई जरूरी है?
सोचिए, सुबह उठते ही सब से पहले हाथ में मोबाइल. सोने से पहले भी जब तक कम से कम एक घंटा स्क्रौलिंग न कर लें तब तक नींद नहीं आती. दिनभर न जाने कितनी बार फोन चैक करते हैं, सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, नोटिफिकेशन देखते हैं. कुछ मिस न हो जाए, इस डर में जीते हैं. यही है डिजिटल एडिक्शन, जिस से आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि सोसाइटी का हर तबका जूझ रहा है.
लेकिन अब एक नया ट्रेंड सामने आ रहा है डंब फोन का. मतलब वही पुराने जमाने वाले मोबाइल जिन में न इंटरनैट है, न सोशल मीडिया, न कैमरा क्वालिटी, न ऐप्स. बस, कौल व एसएमएस.
आज लोग जानबूझ कर स्मार्टफोन छोड़ कर डंब फोन की तरफ लौट रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है, क्या यह वाकई जरूरी है? क्या लोग इसे अपना पा रहे हैं या बस शोऑफ के लिए एक ट्रैंड सैट कर दिया गया है. इस से पहले जान लेते हैं कि ये डंब फोन आखिर होते क्या हैं.
डंब फोन क्या होते हैं
डंब फोन यानी वे मोबाइल जो सिर्फ कौल और एसएमएस के लिए बने हैं. उन में स्मार्टफोन जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. म्यूजिक सुन सकते हैं, अलार्म लगा सकते हैं लेकिन उन में इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप या यूट्यूब जैसे ऐप नहीं चलते. कुछ मौडलों में बेसिक कैमरा या रेडियो होता है, लेकिन बहुत लिमिटेड फंक्शन होते हैं. डिजिटल डिटॉक्स क्या है
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है खुद को कुछ वक्त के लिए डिजिटल स्क्रीन से दूर रखना. जैसे सोशल मीडिया से ब्रेक लेना, मोबाइल से दूरी बनाना, सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही इंटरनैट यूज करना.
सवाल उठता है कि लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्यों बढ़ रहा है डंब फोन का ट्रेंड?
स्क्रीनटाइम से थक चुके लोग : ईवाई कंपनी की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में औसत स्क्रीनटाइम 5 घंटे प्रतिदिन तक पहुंच चुका है. इस में सब से ज्यादा समय सोशल मीडिया, यूट्यूब और ऑनलाइन शॉपिंग पर जाता है.
लोग कहने लगे हैं, 'बस, बहुत हो गया. हर समय फोन में घुसे रहना थका देता है.'
Dit verhaal komt uit de July 2025-editie van Mukta.
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