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भगवद्गीता से सीख: असली जीवन ही श्रेष्ठ है।

Yoga and Total Health

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October 2025

हमारी देश की संस्कृति में अनेक गुणों का, जीवन मूल्यों का वर्णन किया गया है जिनसे हम एक अच्छा, सच्चा और कुशल जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इनका पालन करने के अनेक मार्ग भी हमारे सामने रखे गए हैं। और कई लोग ऐसे होते भी हैं जो पूरे मन से इन मूल्यों को मानते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन मूल्यों को दिल से मानने की जगह बस मानने का दिखावा कर रहे होते हैं। आइए देखते हैं कि ऐसे दिखावटी व्यवहार के बारे में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं।

- डॉ. हंसाजी योगेंद्र

भगवद्गीता से सीख: असली जीवन ही श्रेष्ठ है।

भगवद्गीता के अध्याय 17, श्लोक 12 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं किः

अभिसंध्याय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ [17.12]

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब कोई व्यवहार दिखावे की इच्छा से किया जाता है; तब वह कर्म अस्थिर होता है, अशुभ होता है। यह कर्म या सेवा न ही उचित है और न ही भगवान को प्रिय है।

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