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तो मेरी मेहनत सफल हो गयी...संजय मिश्रा
Mayapuri
|Mayapuri Digital Edition 143
गैर फिल्मी परिवार से आने वाली प्रतिभाओं को बॉलीवुड में सदैव कुछ अधिक ही संघर्ष करना पड़ता रहा है। लेकिन जिनमें प्रतिभा रही, उन्होने बॉलीवुड में अपना डंका बजाया।
ऐसी ही प्रतिभाओं में से एक हैं- अभिनेता संजय मिश्रा। बिहार के एक के गांव में जन्में संजय मिश्रा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने के बाद मुंबई पहुॅचे थे। उन्होने शुरूआत टीवी सीरियलों से की। 1995 में उन्हें फिल्म करने का अवसर मिला और तब से वह लगातार फिल्मों में व्यस्त हैं। कुछ लोग उन्हे हास्य अभिनेता मानते हैं, तो कुछ लोग उन्हे गंभीर किस्म के किरदार निभाने वाला कलाकार मानते हैं। यानी कि संजय मिश्र के दो तरह के फैन्स हैं। संजय मिश्रा की गंभीर किरदार वाली फिल्म "वध" 9 दिसंबर को सिनेमाघरों में पहुॅच चुकी है और संजय मिश्रा के अभिनय की जबरदस्त तारीफ हो रही है। वहीं उनकी हास्य भूमिका वाली फिल्म "सर्कस" आगामी 23 दिसंबर को प्रदर्शित होने वाली है।
प्रस्तुत है संजय मिश्रा से हुई बातचीत के खास अंश...
आप लगभग तीस वर्ष से भी अधिक समय से बॉलीवुड में सक्रिय हैं। इतने लंबे आपके कैरियर में उतार चढ़ाव क्या रहे?
सच कहूँ तो मेरे कैरियर का टर्निंग प्वाइंट तो वह फिल्में भी रही, जिनमें मैने छोटे छोटे किरदार निभाए। फिर चाहे वह 'सत्या' हो या 'बंटी बबली' हो। इन फिल्मों से लोगो ने सवाल करने शुरू किए कि यह कलाकार कौन है? फिर टर्निंग प्वाइंट आया "आफिस आफिस'। फिर 'आल द बेस्ट' आया।
इसके बाद टर्निंग प्वाइंट रही- 'फंस गए रे ओबामा। मैने अपने कैरियर मे टर्निंग प्वाइंट आते हुए देखा व आश्चर्यचकित होता रहा। मैने निर्देशक को झकझोर कर पूछा भी कि आप पागल हो, जो मेरे लिए इस तरह के किरदार लिख रहे हो। मेरे मन में सवाल उठा कि यह किरदार तो नसिरुद्दीन शाह अथवा ओम पुरी के पास जाना चाहिए, पर आप मुझे क्यों दे रहे हैं? तो सामने वाले ने कहा कि उसे मुझ पर मेरी प्रतिभा पर पूरा यकीन है। कहने का अर्थ यह कि मेरे कैरियर में बहुत टर्निंग प्वाइंट हैं।
अब दूसरी तरफ देखा जाए, तो मेरे पिता जी का जो हमेशा से दुःख था कि वह मुझे जिस तरह से स्थायी नौकरी करते हुए देखना चाहते थे। आप मानेंगे नहीं पर उन्होने कह दिया था कि मैं चपरासी तो बन ही सकता हूँ। पर जब लोगो ने मेरी तारीफ करनी शुरू की, तो उनका दुःख गायब हो गया और उन्हे मुझ पर गर्व होने लगा। पिता को गर्व हुआ कि उन्होने अपने बेटे को अच्छी तालीम दी और वह सफल हो गया. भाई भी खुश हुआ।
Dit verhaal komt uit de Mayapuri Digital Edition 143-editie van Mayapuri.
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