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माँ महँगीबाजी के जीवन से जुड़े पूज्य बापूजी के संस्मरण
Rishi Prasad Hindi
|September 2025
१७ अक्टूबर को पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की मातुश्री ब्रह्मलीन माँ महँगीबाजी (अम्माजी) का महानिर्वाण दिवस है।
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उनका जीवन गुरुभक्ति, सेवा, त्याग और परदुःखकातरता का अनुपम उदाहरण है। अम्माजी का जीवन कैसा आग्रहरहित, फरियादरहित था इस बारे में पूज्य बापूजी सत्संग में बताते हैं : 'मैंने अपनी माँ को कभी कोई फरियाद करते हुए नहीं देखा कि 'मुझे इसने दुःख दिया... उसने कष्ट दिया... यह ऐसा है... वह वैसा है...'
जब माँ आश्रम में रहने लगीं तब भी आश्रम की बच्चियों की कभी फरियाद नहीं... आश्रम के बच्चों की कभी फरियाद नहीं। कैसा मूक जीवन! ऐसी आत्माएँ धरती पर कभी-कभार ही आती हैं इसीलिए यह वसुंधरा टिकी हुई है। मुझे इस बात का बड़ा संतोष है कि ऐसी तपस्विनी माता की कोख से यह शरीर पैदा हुआ है।"
अम्माजी की सेवा में रहनेवालीं सजनी बहन द्वारा बताया गया संस्मरण:
...और वह उठकर खड़ा हो गया
जब आश्रम का व्यापक प्रचार नहीं हुआ था तब की बात है। उस समय आश्रम में बहुत कम साधक रहते थे। अहमदाबाद में रहनेवाला मिर्च्मल नाम का एक साधक था। उसकी शादी हुई परंतु उसको संसार से वैराग्य हो गया। वह सब छोड़ के आश्रम में आ गया।
Denne historien er fra September 2025-utgaven av Rishi Prasad Hindi.
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