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नारी को शक्ति मानकर पूजना मात्र पर्याप्त नहीं...
Jyotish Sagar
|April 2024
स्त्री यदि वास्तव में दुर्गा एवं शक्ति का अवतार है, तो यह सम्मान उसे प्रत्येक स्तर पर मिलना ही चाहिए। चाहे वह धार्मिक क्षेत्र हो, राजनीति क्षेत्र हो, आर्थिक क्षेत्र हो या शिक्षा हो।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल में है दूध, आँखों में पानी बहुत समय पहले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ये पंक्तियाँ लिखकर नारी की व्यथा को उजागर किया था। नारी तब भी शक्ति की प्रतीक थी और आज भी है। उसके लिए नए-नए उद्बोधन तथा सम्बोधन है। कभी उसे साक्षात् दुर्गा कहा जाता है, तो कभी दुर्गा का अवतार। हमारे धर्मशास्त्रों ने नारी को गृहलक्ष्मी माना और मनुस्मृति में भी कहा गया है : 'जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं।'
क्या वास्तव में ऐसा है? जिस समाज में नारी को दुर्गा मानकर पूजा गया, धर्मग्रन्थों की रचना की गई, वहीं नारी उत्पीड़न और दमन का शिकार है। हिन्दू धर्म में नारी को प्रतीक मानकर धर्मग्रन्थों की रचना हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी भी धर्म में नारी को प्रतीक मानकर धर्मग्रन्थ नहीं रचे गए। विभिन्न धर्मों में नारी को वन्दनीय तो माना गया, लेकिन उसकी सीमाएँ भी तय कर दी गई। माता के रूप में उसे गुरु के समान माना गया। घर को बच्चे की प्रथम पाठशाला बताया गया। बच्चों को संस्कारवान बनाने की प्रेरणा दी गई, लेकिन जब बात सीधे-सीधे नारी से जुड़ी तो धर्म में भी दीवारें खड़ी कर दी गई। धार्मिक और सामाजिक स्तर पर नारी को विभाजित कर दिया गया। सामाजिक स्तर पर उसे स्वतन्त्रता नहीं मिली और धार्मिक आधार पर उसे रूढ़िवादी बनाकर छोड़ दिया गया। न उसे धर्म का मूल पाठ पढ़ाया गया और न ही सामाजिक स्तर पर उसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए गए। समाज यदि धर्मवान्, नीतिवान् है, तो ये मूल्य सामाजिक स्तर पर क्यों पल्लवित नहीं होते?
शक्ति मानकर पूजना सिर्फ एक धार्मिक कृत्य
Denne historien er fra April 2024-utgaven av Jyotish Sagar.
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